पृष्ठ:निर्मला.djvu/२४४

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वीसवाँ परिच्छेद
 

का बोझ सिर पर लाद ही दिया। काम हो गया। लौट कर निर्मला से बोले- लो भई, बाजी मार ली। रुपए तुमने दिए; पर काम मेरी जवान ही ने किया। बड़ी-बड़ी मुश्किलो से राजी हो गया। यह भी याद रहेगी। जियाराम भोजन कर चुका है?

निर्मला-कहाँ, वह तो अभी घूम कर लौटे ही नहीं।

मुन्शी जी-बारह तो बज रहे होंगे।

निर्मला-कई दफे जा-जाकर देख आई। कमरे में अँधेरा पड़ा हुआ है। मुन्शी जी-और सियाराम?

निर्मला-वह तो खा-पीकर सोए हैं।

मुन्शी जी-उससे पूछा नहीं जिया कहाँ गया है।

निर्मला-वह तो कहते हैं, मुझसे कुछ कह कर नहीं गए।

मुन्शी जी को कुछ शङ्का हुई। सियाराम को जगा कर पूछा'तुमसे जियाराम ने कुछ कहा नहीं,कब तक लौटेगा!गया कहाँ है?

सियाराम ने सिर खुजलाते और आँखें मलते हुए कहा मुझसे कुछ नहीं कहा।

मुन्शी जी-कपड़े सब पहन कर गया है?

सिया०-जी नहीं, कुर्ता और धोती।

मुन्शी जी-जाते वक्त खुश था?

सिया०-खुश तो नहीं मालूम होते थे। कई बार अन्दर आने का इरादा किया; पर देहरी ही से लौट गए। कई मिनिट तक