पृष्ठ:निर्मला.djvu/२५४

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२५? इक्कीसवाँ परिच्छेद इसकी माता इसे घर में रहने न देगी। भगवान् की इच्छा से तुम्हाराधी जल्द विक जायगा। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ रहेगा। साह जी ने रुपए न वापस किए । आखिर लड़के को फिर घी लेने आना ही पड़ेगा । न जाने दिन में कितनी बार चकर लगाना पड़े और किस जालिए से पाला पड़े। उसकी दूकान में जो घी सबसे अच्छा था, वह उसने सियाराम को दिया । सियाराम दिल में सोच रहा था, वात्रा जी कितने दयालु हैं। इन्होंने न सिफारिश की होती, तो साह जी क्यों अच्छा घी देते । सियाराम घी लेकर चला तो बाबा जी भी उसके साथ हो लिए । रास्ते में मीठी-मीठी बातें करने लगे : बच्चा, मेरी माता भी मुझे तीन साल का छोड़ कर परलोक सिधारी थी। तभी से मातृ-विहीन वालकों को देखता हूँ, तो मेरा हृदय फटने लगता है। सियाराम ने पूछा-आपके पिता जी ने भी दूसरा विवाह कर लिया था ? __ साधु-हाँ बच्चा, नहीं तो आज साधु क्यों होता । पहले तो पिता जी विवाह न करते थे। मुझे बहुत प्यार करते थे। फिर न जाने क्यों मन वदल गया-विवाह कर लिया । साधु हूँ, कटु वचन मुंह से नहीं निकालना चाहिए; पर मेरी विमाता जितनी ही सुन्दरी थी, उतनी ही कठोर थी। मुझे दिन-दिन भर खाने को न देती, रोता तो मारती । पिता जी की आँखें भी फिर गई । उन्हें मेरी सूरत से घृणा होने लगी। मेरा