पृष्ठ:निर्मला.djvu/२६८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
२६५
तेईसवॉ परिच्छेद
 

भुङ्गी ने कुछ जवाब न दिया। नाक सिकोड़ कर मुंह फेरे हुए चली गई।

मुन्शी जी आहिस्ता-आहिस्ता आकर अपने कमरे में बैठ गए। आज पहली बार उन्हें निर्मला पर क्रोध पाया; लेकिन एक ही क्षण में क्रोध का आघात अपने ऊपर होने लगा। उस अँधेरे कमरे में फर्श पर लेटे हुए वह अपने को पुत्र की ओर से इतने उदासीन हो जाने पर धिकारने लगे। दिन भर के थके थे। थोड़ी ही देर में उन्हें नींद आ गई।

भुगी ने आकर पुकारा-बाबू जी, रसोई तैयार है। मुन्शी जी चौंक कर उठ बैठे। कमरे में लैम्प जल रहा था।

पूछा-कै वज गए भुगी। मुझे तो नींद आ गई थी।

मुगी ने कहा-कोतवाली के घण्टे में तो नौ बज गए हैं; और हम नाहीं जानित।

मुन्शी जी-सिया वाबू आए?

भुगी-आए होंगे तो घर ही में न होंगे।

मुन्शी जी ने मुझला कर पूछा-मैं पूछता हूँ आए कि नहीं? और तू न जाने क्या-क्या जवाब देती है? आए कि नहीं?

मुगी-मैंने तो नहीं देखा,झूठ कैसे कह दूं।

मुन्शी जी फिर लेट गए और बोले-उनको आ जाने दे,तब चलता हूँ।

आध घण्टे तक द्वार की ओर आँख लगाए मुन्शी जी लेटे रहे। तव वह उठ कर वाहर आए; और दाहिने हाथ कोई दो