पृष्ठ:निर्मला.djvu/२७५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


________________

निर्मला २७२ उसके पास और साधन ही क्या था ? जवानों की जिन्दगी का तो कोई भरोसा ही नहीं, बूढ़ों की जिन्दगी का क्या ठिकाना ? बच्ची के विवाह के लिए वह किसके सामने हाथ फैलाती ? बच्ची का भार कुछ उसी पर तो नहा था। वह केवल पति की सुविधा ही के लिए कुछ बटोरने का प्रयत्न कर रही थी। पति हो की क्यों ? सियाराम ही तो पिता के बाद घर का स्वामी होता । बहिन के विवाह करने का भार क्या उसके सिर न पड़ता ? निर्मला सारी कतर-व्यात पति और पुत्र का सङ्कट मोचन करने ही के लिए कर रही थी। वच्ची का विवाह इस परिस्थिति में सङ्कट के सिवाय और क्या था ? पर इसके लिए भी उसके भाग्य में अपयश ही बदा था। दोपहर हो गया था ; पर आज भी चूल्हा नहीं जला । खाना भी जीवन का काम है-इसकी किसी को सुध ही न थी। मुन्शी जी वाहर बेजान-से पड़े थे, और निर्मला भीतर । वच्ची कभी भीतर जाती, कभी बाहर । कोई उससे वोलने वाला न था। बार-बार सियाराम के कमरे के द्वार पर जाकर खड़ी होती; और 'बैयावैया' पुकारती ; पर 'वैया' कोई जवाब न देता था! सन्ध्या समय मुन्शी जी आकर निर्मला से बोले तुम्हारे पास कुछ रुपए हैं ? निर्मला ने चौंक कर पूछा-क्या कीजिएगा ? मुन्शी जी-मैं जो पूछता हूँ उसका जवाब दो।