पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/२०१

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दिवाला.
 

"यह क्या है? किस दुष्ट की दुष्टता सै हम पर यह गज़ब का गोला एक साथ आ पड़ा?” लाला मदनमोहन आंखों मैं आंसू भर कर बड़ी कठिनाई सै इतनी बात कह सके.

"क्या कहूं? कोई बात समझ मैं नहीं आती" मुन्शी चुन्नीलाल कहनें लगे “कल लाला ब्रजकिशोर यहां सैं ऐसे बिगड़ कर गए थे कि मेरे मन मैं इसी समय खटका हो गया था शायद उन्हीं नें यह बखेड़ा उठाया हो बाज़े आदमियों को अपनी बात का ऐसा पक्ष होता है कि वह औरों की तो क्या? अपनी बरबादी का भी कुछ विचार नहीं करते. परमेश्वर ऐसे हटीलों सै बचाय. हरकिशोर का ऐसा होसला नहीं मालूम होता और वह कुछ बखेड़ा करता तो उस्का असर कल मालूम होना चाहिये था अब तक क्यों न हुआ है?"

प्रथम तो निहालचन्द कल सै अपनें मन मैं घबराहट होनेंका हाल आप कह चुका था, दूसरे हरकिशोर की तरफ़ सै नालिश दायर होकर सम्मान आगया, तीसरे चुन्नीलाल ब्रजकिशोर के स्वभाव को अच्छी तरह जान्ता था इस्लिये उस्के मन मैं ब्रजकिशोर की तरफ़ सै ज़रा भी संदेह न था परन्तु वह हरकिशोर की अपेक्षा ब्रजकिशोर सै अधिक डरता था इसलिये उस्नें ब्रजकिशोर ही को अपराधी ठैरानें का विचार किया अफ़सोस! जो दुराचारी अपनें किसी तरह के स्वार्थ सै निर्दोष और धर्मात्मा मनुष्यों पर झूंटा दोष लगाते हैं अथवा अपना क़सूर उन्पर बरसाते हैं उन्के बराबर पापी संसार मैं और कौन होगा?

लाला मदनमोहन के मन मैं चुन्नीलाल के कहनें का पूरा विश्वास होगया उस्नें कहा "कि मैं अपनें मित्रों को रुपे की