पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/२९३

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प्रेत भय.
 

रोक टोक नहीं की थी परन्तु अब करनी पडी वह छोटे छोटे, बच्चे मदनमोहन के साथ घर जानें की ज़िद करते थे और ज़बरदरती हटानें सै फूटफूटकर रोते थे लोगोंके हाथों से छूट, छूट कर मदनमोहन के गले सै जा लिपटते थे इसलिये इस्समय ऐसी करुणा छा रही थी कि सब की आंखो सै टप, टप आंसू टपकनें लगे.

निदान उन बच्चों को बड़ी कठिनाई सै रखवाले के साथ घर भेजा गया और हवालात का दरवाज़ा बन्द हुआ.

 
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