पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/३०७

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
२९७
सुधरनें की रीति.
 


जानें दूंगा और अपने सुखके लिये अनुचित मार्ग पर पांव न रक्खूंगा" लाला मदनमोहननेबड़ी दृढतासै कहा.

"इस्समय आप यह बातें निस्संदेह मनसै कहते हैं परन्तु इस तरह प्रतिज्ञा करनें वाले बहुत मनुष्य परीक्षाके समय दृढ नहीं निकलते मनुष्य का जातीय स्वभाव ( आदत ) बडा प्रबल है। तुलसीदासजीने भगवान से यह प्रार्थना की है:---

"मेरो मन हरिजू हठ न तजैं॥ निशिदिन नाथ देउं सिख बहुबिध करत सुभाव निजै। ज्यों युवति अनुभवति प्रसव अति दारुण दुख उपजै॥ व्है अनुकूल बिसारि शुलशठ पुनि खल पतिदि भजै॥ लोलुप नमत गृह पशु ज्यों जहं तहं पदत्राण बजैं॥ तदपि अधम बिचरत तेहि मारग कबहुं न मूढलजै॥ हों हायर्यो करि यत्न बिबिधि विधि अतिशय प्रबल अजै॥ तुलसिदास बस होइ तबहि जब प्रेरक प्रभु बरजै।" आदतकी यह सामथ्र्य है कि वह मनुष्य की इच्छा न होंनें परभी अपनी इच्छानुसार काम करा लेती है, धोका दे, देकर मनपर अधिकार करलेती है, जब जैसी बात करानी मंजूर होती है तब वैसीही युक्ति बुद्धि को सुझाती है, अपनी घात पाकर बहुत काल पीछे रुख में छिपीहुई अग्निके स्मान सहसा चमक उठती है मैं गई बीती बातों की याद दिवाकर आपको इस्समय दुखित नहीं किया चाहता परन्तु आपको याद होगी कि उस्समय मेरी ये सब बातें चिकनाई पर खुदके समान कुछ असर नहीं करती थीं इसी तरह यह समय निकल जायगा तो मैं जान्ता हूं कि यह सब विचार भी वायु की तरह तत्काल पलट जायँगे हम लोगों का लखोटिया ज्ञान है वह. आपके पास जानें सैं पिगल जाता है परन्तु उस्सै अलग होतेही