पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/३०८

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परीक्षागुरु.
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फिर कठोर होजाता है इस दशा मैं जब इस्समय का दुःख भूलकर हमारा मन अनुचित सुख भोगनें की इच्छा करे तब हमको अपनी प्रतिज्ञा के भय सै वह काम छिपकर करनें पड़ें, और उन्को छिपानें के लिये झूंटी ठसक दिखानी पड़े झूंटी ठसक दिखानें के लिये उन्हीं स्वार्थपर मित्रोंका जमघट करना पड़े, और उन स्वार्थ पर मित्रोंका जमघट करनें के लिये वही झूंटा पक्षपात करना पड़े तो क्या आश्चर्य है?" लाला ब्रजकिशोर नें कहा.

"नहीं, नहीं यह कभी नहीं हो सक्ता मुझको उन लोगों सै इतनी अरुचि हो गई है कि मैं वैसी साहूकारी सै ऐसी ग़रीबी को बहुत अच्छी समझता हूं क्या अपनी आदत कोई नहीं बदल सक्ता? लाला मदनमोहन नें जोर देकर पूछा.

"क्यों नहीं बदल सक्ता? मनुष्य के चित्त सै बढ़कर कोई वस्तु कोमल और कठोर नहीं है वह अपनें चित्त को अभ्यास करके चाहै जितना कम ज्यादः कर सकता है कोमल सै कोमल चित्त का मनुष्य कठिन सै कठिन समय पड़नें पर उसे भी झेललेता है और धीरै, धीरै उस्का अभ्यासी हो जाता है इसी तरह जब कोई मनुष्य अपनें मनमैं किसी बातकी पक्की ठान ले और उस्का हर वक्त ध्यान बना रक्खे उस्पर अन्त तक दृढ रहै तो वह कठिन कामों को सहज मैं कर सक्ता है परन्तु पक्का विचार किये बिना कुछ नहीं हो सकता" लाला ब्रजकिशोर कहनें लगे:––

"इटली का प्रसिद्ध कवि पीट्रार्क लोरा नामी एक परस्त्री पर मोहित हो गया इसलिये वह किसी न किसी बहानें सै उस्के सन्मुख जाता और अपनी प्रीतिभरी दृष्टि उस्पर डाल्ता परन्तु