पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/४८

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परीक्षा गुरु
४०
 

"आप तो फिर वही मन की वृत्तियों का झगड़ा ले बैठे मेरे सवाल का जवाब दीजिये या हार मानिये" लाला मदन मोहन उखता कर कहने लगे.


“जब आप पूरी बात ही न सुनें तो मैं क्या जवाब दूँ? मेरा मतलब इतने विस्तार से यह था कि सब वृत्तियों का संबंध मिला कर अपना कर्तव्य कर्म निश्चय करना चाहिये. किसी एक वृत्ति की प्रबलता से और वृत्तियों का विचार किया जायगा तो उसमें बहुत नुक्सान होगा” लालाब्रजकिशोर कहने लगेः

"वाल्मीकि रामायण में भरत से रामचन्द्र ने और महाभारत में नारद मुनि ने राजा युधिष्टिर से ये प्रश्न किया है ‘धर्महि धन, अर्थहि धरम बाधक तो कहुँ नाहि?॥ काम न करत बिगार कछु पुन इन दोउन मांहि॥"१


बिदुरप्रजागर में बिदुर जी राजा धृतराष्ट्र से कहते हैं "धर्म अर्थ अरु काम, यथा समय सेवत जु नर॥ मिल तीनहुँ अभिराम ताहि देत दुहुँलोक सुख॥"२


विष्णुपुराण में कहा है "धर्म बिचारै प्रथम पुनि अर्थ, धर्म अविरोधि॥ धर्म, अर्थ बाधा रहित सेवै काम सुसोधि॥"३


रघुवंश में अतिथि की प्रशंसा करते बार महाकवि कालि-


१.कच्चिदर्थेन वा धर्म धर्मेणार्थे मथा पिवा!!
उभी वा प्रीतिसारेण न कामेन प्रबाधसे॥
२. योधर्मं मर्थ कामं च यथा कालं निषेवते।
धर्मार्थ काम संयोगं सोमुत्नेहच विन्दति॥
२. विबुुद्धश्चिन्तयेविबुद्धश्चिन्तयेद्धर्म मर्थ चास्या विरोधिनम्॥
अपीडया तयो: काम मुभयोरपि चिन्तयेत्।