पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/७१

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सभासद.
 


प्रसन्नता, लोगों की वाह-वाह, अपने शरीर का सुख और थोड़े ख़र्च में बहुत पैदा करने के लालच के सिवाय किसी काम में रुपया ख़र्च करना अच्छा नहीं लगता था पर रुपया पैदा करने अथवा अपने पास की दौलत को बचा रखने के ठीक रास्ते नहीं मालूम इसलिये मुन्शी चुन्नीलाल उनको उनकी इच्छानुसार वार्ता बनाकर खूब लूटता था.


मास्टर शिंभूदयाल प्रथम लाला मदनमोहन को अंग्रेजी पढ़ाने के लिये नौकर रखा गया था पर मदनमोहन का मन बचपन से पढ़ने लिखने की अपेक्षा खेल कूद में अधिक लगता था. शिंभूदयाल ने लिखने पढ़ने की ताकीद की तो मदनमोहन का मन बिगड़ने लगा. मास्टर शिंभूदयाल खाने पहनने, देखने, सुनने का रसिक था और लाला मदनमोहन के पिता अंग्रेजी नहीं पढ़े थे इस लिये मदनमोहन से मेल करने में इसने हर भांति अपना लाभ समझा. पढ़ाने लिखाने के बदले मदनमोहन बालक रहा जितने अलिफ्लैला में से सोते जागते का, शेक्सपियर के नाटकों में से कोमेडी आफ एर्रज, खेलफ्थनाइट, मचएडू अबाउट नथिंग, बेनजान्सन का एब्रीमैन इनहिज ह्यूमर; स्विफ्ट के ड्रपीअर्सलेटर्स, गुलिबर्स ट्रेवल्स, टेल आफ ए टव; आदि सुनाकर हँसाया करता था और इस युक्ति से उसको, टोपी, रुमाल,घड़ी,छड़ी आदि का बहुधा फायदा हो जाता था. जब मदनमोहन तरुण हुआ तो अलि- फ्लैला में से अबुलहसन, और शम्युल्निहार का किस्सा शेक्सपियर के नाटकों में से रोमियो एंड जूलियट आदि सुना-