पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१२०

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छै, कोई कीचड़ उछारै छै ! क्या करें बिचारे एक तो हिन्दू,दूसरे कमजोर, तीसरे परदेशी सभी तरह आफ़त है। दूसरे नई रोशनीवाले देशभाइयों की बैलच्छ देख देख जले जाते हैं । यह चाहते हैं सब ज्यैंटिलमैन बन जायँ, वहां आदमी बनना भी नापसंद है। ...."मुंह रंगे हनूमान जी की बिरादरी में मिले जाते हैं। तीसरे दाढ़ीवाले हिन्दू दिनभर रंग अबीर धोत्रो, ‘पर ललाई कहां जाती है । जो किसी ने गंधा पिरोजा लगा दिया तो और भी आफ़त है। लो, इतने हमने बता दिए, कुछ तुम भी सोचो।


ककाराष्टक।

ज्योतिष जाननेवाले जानते हैं कि होडाचक्र के अनुसार एक अक्षर पर जितने नाम होंगे उनका जन्म एक नक्षत्र के एक ही चरण का होगा, और लक्षण भी एक ही सा होगा। व्यव- हार-सम्बन्धी विचार में ऐसे नामों के लिए ज्योतिषियों को बहुत नहीं विचारना पड़ता। बिना विचारे कह सकते हैं कि एक राशि, एक नक्षत्र, एक चरण के लोग मिल के जो काम करेंगे वह सिद्ध होगा। लोक में भी नाम-राशी का अधिक सम्बन्ध प्रसिद्ध है। इसी विचार पर सतयुग में सत्य, सज्जनता, सद्धर्मादि का बड़ा गौरव था। हमारे पाठक जानते होंगे कि श्री महाराजाधिराज कलियुग जी देव (फारसी में भी तो) बड़े छंटे बड़े नीतिनिपुण