पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१२२

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दूसरे के मानों अंग प्रत्यंग हैं। एक के बिना दूसरा निर्बल है,और उन्हीं के एका का फल है कि कलिदेव राज करते हैं । यह परिचयस्तोत्र पाठकों की श्रद्धा बढ़ाने मात्र को दिया है।


मुक्ति के भागी।

एक तो छः घर के कनवजिये, क्योंकि वैराग्य इनमें परले सिरे का होता है । सब जानते हैं कि स्त्री का नाम अर्धाङ्गी है । बेपढ़े लिखे लोग तक आपस में पूछते हैं “कहौ घर का क्या हाल है ?" इससे सिद्ध हुआ कि घर स्त्री ही का नामांतर है। उस स्त्री को यह महा तुच्छ समझते हैं। यहां तक कि 'हे: मेहरिया तौ आय पायें कै पनहीं', बरंच पनहीं के खो जाने से तो रुपया-वेली का सोच भी होता है, परन्तु स्त्री का बहुतेरे. मरना मनाते हैं। अब कहिये, जिसने अपने आधे शरीर एवं ग्रह-देवता को भी तृणवत् समझा उस परम त्यागी वैरागी की मुक्ति क्यों न होगी?

दूसरे अढ़तिए, क्योंकि प्रेतत्व जीते ही जी भुगत लेते हैं। न मानो कानपुर आके देख लो, बाजे बाजों को आधी रात तक दतून करने की नौबत नहीं पहुंचती। दिन रात बैपारियों की हाव २ में यह भी नहीं जानते कि सूरज कहां निकलता है। भला जिसे जगत्-गति व्यापती ही नहीं, जिसे क्षुधा-तृषा लगती ही नहीं है, उस जितेंद्री महापुरुष को मुक्ति न होगी,