पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१३९

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से उनके अल्प थे तौ भी इसमें सन्देह नहीं है कि आपके भी सब काम और सब बातों में अशुद्धि का संभव है। फिर आप किस मुँह से दूसरों को बुरा कहें, जब कि भलाई-बुराई सब में है। तो मतवालों को यह अधिकार किसने दिया है कि दूसरे की बुराई गावैं ? यह उनकी शुद्ध दुष्टता नहीं है तो क्या है ? श्री रामानुज, श्री शंकराचार्य, श्री मसीह, श्री मुहम्मद सब मान्य पुरुष थे। इनमें से किसी के जीवन चरित्र में ऐसी बातें नहीं पाई जाती जैसी आजकल के लोग मुँह से बुरी बताते हैं पर करते अवश्य हैं । इसी प्रकार वेद, पुराण, बाइबिल, कुरआन सब धर्मग्रन्थ हैं, क्योंकि चोरी, जारी, विश्वासघात आदि की आज्ञा किसी में नहीं है। फिर इनकी निन्दा करने वाला स्वयं निन्दनीय नहीं है तो क्या है ?

यदि परमेश्वर संसार भर का स्वामी है और सभी की भलाई का उद्योग करता है तो यह कैसे हो सकता है कि एक ही भाषा की एकही पोथी और केवल एकही आचार्य की बनाई हुई सब देशों और सब काल के लिये ठीक हो सके ? हर देश के लोगों की प्रकृति स्वभाव, सामर्थ्य, भाषा, चाल-ढाल, खाना- पहिनना आदि एक सा कभी नहीं हो सकता। फिर ईश्वर की एक ही आज्ञा सब कहीं के,सब जन कैसे पालन कर सकते हैं ? आज भारतवर्ष का कौन राजा अश्वमेध अथवा राजसूय यज्ञ कर सकता है ? अरब (या अपने ही यहां बंगाल) के रहने वाले माँस बिना कै दिन सुख से रह सक्ते हैं ? चालीस चालीस दिन