पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१४

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के दुकानदार बाबू देवीप्रसाद खत्री को मिश्र जी ने होली के दिनों में कबीरें सुना कर बुरी तरह से छेड़ दिया। वे बहुत क्रुद्ध हुए। पर ज्यों ज्यों देवीप्रसाद जी का क्रोध उमड़ता जाता था, त्यों त्यों मिश्र जी की कबीरें और भी ज़ोरदार होती जाती थीं। मामला यहाँ तक बढ़ा कि देवीप्रसाद जी ने प्रतापनारायण जी के मित्र कोतवाल अलीहसन जी से शिकायत की। बस, फिर क्या था, दूसरे ही दिन मिश्र जी देवीप्रसाद जी से माफ़ी माँगने उनकी दूकान पर पहुंचे। माफ़ी माँगते समय उन्होंने पूरा स्वाँग रचा। वे इतने विनम्र हो गये कि देवीप्रसाद जी हँस पड़े और क्षण भर में उनका क्रोध उतर गया।

उन दिनों कानपुर में ईसाइयों ने बड़ी धूम मचा रक्खी थी। जगह जगह उनके प्रचारक लोग लेक्चरबाज़ी करते तथा अपने धर्म-ग्रंथ बाँटते देख पड़ते थे। उनसे प्रतापनारायण जी की अक्सर टक्करें हुआ करती थीं और इन शास्त्रार्थों में वे वाक्प्रगल्भता तथा मखो़लपने का इतना प्रदर्शन करते थे कि ईसाइयों को शर्माना पड़ता था और एकत्र श्रोतागण का पूरा मनोरंजन होता था।

उनकी दिल्लगीबाजी के बहुत से उदाहरण लोगों को याद हैं। मेरे पिता जी ने भी एक आपबीती बात मुझे बतलाई थी। वे लगभग मिश्र जी के समवयस्क थे और उनसे उनकी घनिष्टता भी थी। जब कभी कानपुर जाते तो प्रतापनारायण जी से अवश्य मिला करते थे। एक बार ऐसा हुआ कि मेरे