पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१७३

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दिन चाहे बरसों की रोगिणी क्यों न हों, पर अन्न की कणिका वा जल की बूंद कभी मुंह में न धरेंगी, रामनौमी, जन्माष्टमी,पितृविसर्जनी आदि आने पर, चाहे जैसे हो, थोड़ा बहुत धर्मो-त्सव अवश्य करेंगी। सच पूछो तो आर्यत्व की स्थिरता में वही अनेकांश श्रद्धा दिखाती हैं, नहीं आपने तो छब्बीसाक्षरी मंत्र पढ़कर चुरुटाग्नि में सभी कुछ स्वाहा कर रक्खा है।

यद्यपि गृहेश्वरी के यजन-भजन का उद्देश्य प्रायः आप ही के मंगलार्थ होता है, पर आप तो मन और वचन से इस देश ही के न ठहरे। फिर यहांवालों के आंतरिक भाव कैसे समझे ? बन्दर की ओर बरफ़ी लेकर हाथ उठाओ तौ भी वह ढेला ही समझ कर खी, खी, करता हुआ भागेगा! विचारी सीधी सादी अबला-बाला ने न कभी विधर्मी शिक्षा पाई है, न मुंह खोलके कभी मरते २ भी अपने पराए लोगों में नाना भांति की जटल्ले कहने सुनने का साहस रखती हैं। फिर बाबू साहब को कैसे लेक्चरबाज़ी करके सभझा दें कि तोता मैना तक मनुष्य की बोली सीखके मनुष्य नहीं हो जाते, फिर आपही राजभाषा सीख कर कैसे राजजातीय हो जायंगे ? देह का रंग तो बदल ही नहीं सकते, और सब बातें क्यों कर बदल लीजिएगा ? हां, दूसरे की चाल चलकर कृतकार्य तो कोई हुवा नहीं, अपनी हंसी कराना होता है वही करा लीजिए।

अब यहां पर विचारने का स्थल है कि जहां दो मनुष्य न्यारे २ स्वभाव के हों, और एक की बातें दूसरे को घृणित