पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१८४

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खिले जाते हैं जामे में नहीं फूले समाते हैं।
सबा ने गोशे गुल में हां यह खुश खबरी सुनाई है।
कि जिसके नाम पर हर ज़िन्दा दिल सौजी से कुर्बां हैं।
खु़दा का शुक्र वाजिब है शिफ़ा आज उसने पाई है॥
भला वह कौन है यह मुज़दा सुन कर जो न कह उठता।
मुबारक हो मुबारक हो बधाई बधाई है॥
ख्याल आया मुझे दिल में य किसका गुस्ले सेहत है।
कि सारे हिन्द में जिस्की खुशी सबने मनाई है॥
तो मुलहिम ने कहा बाबू हरिश्चन्द्र इसमें पाक उस्का।
नहीं मालूम ? जिसकी मदहख्वां सारी खुदाई है।
बनारस की ज़मी नाजां है जिसकी पायबोसी पर।
अदब से जिसके आगे चर्ख ने गरदन झुकाई है॥
वही महताबे हिन्दुस्तां वही गैरत दिहे नैयर।
कि जिसने दिल से हर हिन्दू के तारीकी मिटाई है॥
वही ईसाए दौरां जिसने हम क़ौमौं की हिम्मत की।
हजारों साल पीछे लाशे बोसीदा जिलाई है॥
वही उसने कि उर्दू देवनी के पंजए जुलसे।
वसद तदवीरो हिम्मत जान हिन्दी की बचाई है॥
वही जो आज मालिक हैं सब इल्मों के खजाने का।
वही मुल्के हमा खूबी पय जिसकी बादशाही है॥
जिहे वह अफ़जलुल फजुला कि आज उसकी शहादत में।
ब सिदके दिल हर एक उस्ताद ने उंगली उठाई है॥