पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१८५

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सब उसके काम ऐसे हैं कि जिन को देख हैरत से।
हर एक आकिल ने अपनी दाँत में उंगली दबाई है॥
उसे रहबर अगर इस मुल्क का कहिये तो लावुद है।
उसी ने सबको पहिले राहे बहबूदी सुझाई है॥
बहुत लोगों को है दावा वतन की खैरख़्वाही का।
कोई पूछै तो इनसे चाल यह किसकी उड़ाई है॥
तरक्क़ी क्या है? कैसे होय है? होता है क्या उससे?
किसी को कुछ खबर भी थी उसी ने सब बताई है॥
सिवा उसके जो सच पूछो तो ऐसा कौन है जिसने।
निकाली बात जो कुछ मुँह से है वह कर दिखाई है॥
उठै है किससे बारे इश्क़े हक़ हमदरदिये अखवां।
सिवा उसके यह हिम्मत किसको कुदरत किसने पाई है॥
बरहमन यह सुरूर आया मुझे है बस्फ़ उसका सुनने से।
कि मेरी रूह इस तन में नहीं फूली समाई है॥
लिखूं तारीफ़ कुछ उसकी यह मेरी तबअ ने चाहा।
तो फिर मुहहिम ने फरमाया गुमां बेजा यह भाई है॥
उसे क्या कोई दिखलावेगा अपने खामः के जौहर।
रसा है वह खुद उसके जिहन की वां तक रसाई है॥
कि जिस जा ख्वाब में पहुंचे खयाल इंसां का क्या मुमकिन।
फ़रिश्तों ने जहां जाने में अकसर जक् उठाई है॥
जहां तक कीजिये तौसीफ़ उसकी सब बजा लेकिन।
नहीं उरफ़ी को दावा दूसरों की क्या चलाई है॥