पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/२१०

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( १९९)

कभी जो ध्यान तक आता सहबाए मुहब्बत का॥९॥
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स्फुट सवैये और कवित्त।
बाम बसैं नित पारबती तऊ जोगि सिरोमनि काम अराती।
पान कियों अति तुच्छ हलाहल तौ हू आनन्द रहैं दिन राती॥
भूत सखा घर घोर मसान तऊ शिवरूप सदा सब भांती।
धन्य है प्रेम प्रभाव पवित्र बिचारत ही जिहि बुद्धि बिलाती॥१॥
भावै अवासहि में दुरि बैठिबो वास में आनन ढांकि रहे हैं।
बात चले परतापनरायन गात सबै थहरात महै हैं॥
शोर करें सिसकी के घने निसिनाथ ते दूरि रह्यो ही चहै हैं।
लोग सबै ऋतु शीत की भीति ते नारि नवोढ़ा की रीति गहै हैं॥२॥
मारन मार लग्यों कुसुमायुध ज्यों जगते हैं उचाट उमाहत।
बुद्धि रही थमि मेरो प्रताप तिहारे स्वरूप समुद्रहि थाहत॥
बर्सि सुधा मृदु बोलन में मन कर्सि लियों कि बनै न सराहत।
नेक हंसी में बसी करिकै तुम मोहिकै मोहि कहा कियो चाहत॥३॥
कल पावैं न प्राण तुम्हैं बिन देखें इन्हें अधिकौ कलपाइए ना।
परतापनरायन जू के निहोरे प्रीति प्रथा बिसराइए ना॥
अहो प्यारे बिचारे दुखारेन पै इतनी निठुराई जताइए ना।
करि एक ही गांव में बास हहा सुख देखिबे को तरसाइए ना॥४॥
योहूं हंस हंसिहैं सब वोहूं दुहूं बिधि सों उपहास तो हैऐ।
तौ परताप वियोग की ताप में क्यों फिर आपनो जीव जरैऐ॥