पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/२२६

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(२१५)
जब हम कहत रहे निज बूते सकल सृष्टि सों तृप्यन्ताम ॥
(२९)
पितर देवता सबते बढ़िकै माननीय तव पद अभिराम ।
कुपथ सुपथ के भेद बताए तुमहीं हमैं चिन्हाए राम ।।
तुमते उरिन न है हैं जो हम वारि देहिं सब तन धन धाम ।
सरल सनेह निहारि हमारी हूजै गुरुवर तृप्यन्ताम ॥
(३०)
जगहितैषिता धर्मनिष्ठता विपुलवीरता के करि काम ।
सुत उपजाए बिना लह्यो तुम न्यायनि लगत पितामह नाम ।।
हरि निज प्रण तजि तव प्रण राख्यो भाख्यो जिन्हें श्रुतिन सति धाम ।
श्रद्धा सरित सलिल सों हमरेहु गंग तनय जू तृप्यन्ताम ।।
|(३१)
सदा सकल जग भ्रमत रहत हौ करत प्रकाश ठाम ही ठाम ।
सांची कही कहूं देख्यो है देश हिन्द सम अचरज धाम ।।
निज भाषा हू ते निराश लहि बसहिं लोग हतभाग तमाम ।
होहु भानु भगवान देखि यह अद्भुत कौतुक तृप्यन्ताम ।।
(३२)
देख तुम्हारे फरज़न्दों का तौरो-तरीक तुमाश्रो कलाम ।
खिदमत कैसे करूँ तुम्हारी अकल नहीं कुछ करती काम ।।
आबे राङ्ग नज़र गुज़रानूं या कि मये-गुलगूं का जाम ।
मुंशी चितरगुपत साहब तसलीम कहूँ या तृप्यन्ताम ।।
हरि शशि बतसर छह असित, आसिन मास ललाम ।