पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/२३१

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( २२० )
प्रार्थना १
शरणागत पाल कृपाल प्रभो!
हमको इक आस तुम्हारी है।
तुम्हरे सम दूसर और कोऊ
नहिं दीनन को हितकारी है।।
सुधि लेत सदा सब जीवन की
अति ही करुना बिस्तारी है।
प्रतिपाल करें बिनही बदले
अस कौन पिता महतारी है।।
जब नाथ दया करि देखत हौ
छुटि जात बिथा संसारी है ।
बिसराय तुम्हें सुख चाहत जो
अस कौन नदान अनारी है ।।
परवाहि तिन्हें नहिं स्वर्गहु की
जिनको तव कोरति प्यारी है।
धनि है धनि है सुखदायक जो
तव प्रेम सुधा अधिकारी है।।
सब भाँति समर्थ सहायक हौ
तव आश्रित बुद्धि हमारी है।
"परताप नरायण" तौ तुम्हरे
पद पंकज पै बलिहारी है।।