पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/२३२

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( २२१ )
प्रार्थना २
पितु मात सहायक स्वामि सखा
तुमही इक नाथ हमारे हो।
जिनके कछु और अधार नहीं
तिनके तुमही रखवारे हो।।
सब भाँति सदा सुखदायक हो
दुख दुर्गन नासनहारे हो ।
प्रतिपाल करौ सगरे जग को
अतिसै करुना उर धारे हो।।
भुलिहैं हमही तुम को तुम तौ
हमरी सुधि नाहिं विसारे हो।
उपकारन को कछु अंत नहीं
छिन ही छिन जो बिस्तारे हो॥
महराज महा महिमा तुम्हरी
समुझै बिरले बुधिवारे हो।
शुभ शांतिनिकेतन प्रेमनिधे !
मन मंदिर के उजियारे हो।।
यहि जीवन के तुम जीवन हो
इन प्रानन के तुम प्यारे हो ।
तुम सों प्रभु पाय “प्रताप हरी"
किहि के अब और सहारे हो।।