पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/३९

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और भारतेंदु हरिश्चंद्र प्रधान थे। भट्ट जी ने अपने हिंदी-प्रदीप' के द्वारा ठीक उसी प्रकार हिंदी-गद्य की अभिवृद्धि करने का प्रयत्न किया है जैसा कि मिश्र जी ने 'ब्राह्मण' के द्वारा किया है। दोनों ही का प्रधान उद्देश्य जनसाधारण की रुचि हिंदी की ओर आकर्षित करना तथा होनहार लेखकों को प्रोत्साहन देना था।'हिंदी-प्रदीप' के लेख कहीं ऊँचे दर्जे के होते थे, किंतु 'ब्राह्मण' विशेषकर अधकचरे पाठकों के मनोविनोद का मसाला प्रस्तुत करता था।

इसके सिवाय प्रतापनारायण जी जिस ढंग की शैली का व्यवहार करते हैं, वह मुहावरों, लोकोक्तियाँ तथा हास्य-व्यंग से सराबोर होने के कारण रोचक तो खूब जान पड़ती है, पर वह उत्कृष्ट कोटि की कदापि नहीं कही जा सकती; क्योंकि उसमें बहुत जगह भाषा-शैथिल्य, व्याकरण-दोष तथा अन्य प्रकार की असमीचीनता है। विराम-चिह्नों का तो नाम तक नहीं मिलता। मजाक करने में भी कहीं कहीं मिश्र जी साधारण शिष्टता का उल्लंघन बे रोक-टोक कर डालते हैं।

इन खटकनेवाले दोषों के रहते हुए भी प्रतापनारायण की गद्य-शैली पुराने गद्य-लेखकों की शैली का अत्यंत परिपक्व तथा विकसित रूप है। उसका मुख्य गुण यह है कि वह बड़ी सुबोध और भावपूर्ण है। दूसरे उसमें वह गुण है जो प्रत्येक उच्चकोटि के गद्य में मिलता है, अर्थात् प्रतापनारायण जी के लेखों को पढ़कर पाठक को उनकी तबीयत का तथा उनके चरित्र का