पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/४७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।

(३७)


पर हुक्म चला के उसकी स्वतंत्र मनोहरता का नाश नहीं करने के। जो कविता के समझने की शक्ति नहीं रखते वे सीखने का उद्योग करें। कवियों को क्या पड़ी है कि किसी के समझाने को अपनी बोली बिगाड़ें।"

स्पष्टतया, प्रतापनारायण ने यह बड़ी विवादास्पद बात कह डाली है। ब्रजभाषा के लालित्य को स्वीकार करना और बात है, किंतु उसी को कवितोपयुक्त मानने में हठ करना दूसरी बात है। आजकल खड़ी बोली में अच्छी से अच्छी रचनाएँ धड़ाधड़ निकल रही हैं। पर, उनके लिए यह कहना अनिवार्य था। क्योंकि उनका ब्रजभाषा का प्रेम तथा पक्षपात स्वाभाविक था। वे कानपुर के प्रसिद्ध कवि पंडित ललिताप्रसाद जी त्रिवेदी के चेले थे तथा बाबू हरिश्चंद्र के उपासक थे। इसके सिवाय वह जमाना भी ब्रजभाषा की कविता का था। वे स्वयं रसीली तबीयत के आदमी थे। उनकी भावुकता, उनकी प्रेम-पूर्णता ब्रजभाषा की कविता से ही तृप्त हो सकती थी।

मिश्र जी की समस्त काव्य-रचनाएँ तीन तरह की हैं:---

१. वह कविता जो वे 'स्वांतःसुखाय' लिखते थे।

२. सामयिक।

३. उपदेश-पूर्ण।

पहले ढंग की कविताओं में 'बुढ़ापा', 'साधो मनुवाँ अजब दिवाना', 'शरणागत पाल कृपाल प्रभो', 'मन की लहर' की