पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/६०

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हैं, क्योंकि जैसे एशिया की कई बोलियों में 'पकार' को 'बकार' व 'फ़कार' से बदल देते हैं, जैसे पादशाह-बादशाह पारसी- फ़ारसी आदि, वैसे ही कई भाषाओं में शब्द के आदि में 'बकार' भी मिला देते हैं, जैसे वक्ते शब-बवक्ते शब तथा तंगबामद-बतंगआमद इत्यादि, और शब्द के आदि की ह्र स्व अकार का लोप भी हो जाता है जैसे अमावस का मावस, (सतसई आदि ग्रंथों में देखो) ह्र स्व अकारांत शब्दों में अकार के बदले ह्र स्व वा दीर्घ उकार भी हो जाती है, जैसे एक-एकु, स्वाद-स्वादु आदि। अथच ह्र स्व को दीर्घ, दीर्घ को ह्र स्व अ, इ, उ, आदि की वृद्धि वा लोप भी हुवा ही करता है, फिर हम क्यों न कहें कि जिन शब्दों में अकार और पकार का संपर्क हो, एवं अर्थ से श्रेष्ठता की ध्वनि निकलती हो वह प्रायः समस्त संसार के शब्द हमारे प्राप्त महाशय वा आप ही के उलट फेर से बने हैं।

अब तो आप समझ गये न, कि आप क्या हैं ? अब भी न समझो तो हम नहीं कह सकते कि आप समझदारी के कौन हैं ! हां, आप ही को उचित होगा कि दमड़ी छदाम की समझ किसी पंसारी के यहां से मोल ले आइए, फिर आप ही समझने लगियेगा कि आप "को हैं ? कहां के हैं ? कौन के हैं ?" यदि यह भी न हो सके, और लेख पढ़ के आपे से बाहर हो जाइए तो हमारा क्या अपराध है ? हम केवल जी में कह लेंगे "शाव! आप न समझो तो आपां को के पड़ी छै ।" ऐं! अब भी नहीं