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पृष्ठ:प्रतिज्ञा.pdf/२१०

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प्रतिज्ञा

सकती; यह बात वह क्यों भूल गये! एक अटल सत्य के विरोध करने का प्रायश्चित्त अब उनके सिवाय और कौन करेगा? मधुर कण्ठ से बोले--पूर्णा तो वनिता-भवन पहुँच गई।

प्रेमा कूछ निश्चय न कर सकी कि इस ख़बर पर प्रसन्न हो या खिन्न। दाननाथ ने यह बात किस इरादे से उससे कही? उनका क्या आशय था, वह कुछ न जान सकी। दानदाथ कदाचित् उनका मनोभाव ताड़ गये। बोले--अब उसके विषय में कोई चिन्ता नहीं रही। अमृतराय उसका बेड़ा पार लगा देंगे।

प्रेमा को यह वाक्य भी पहेली-सा जान पड़ा। यह अमृतराय की प्रशंसा है या निन्दा? अमृतराय उनका बेड़ा कैसे पार लगा देंगे? साधारणतः तो इस वाक्य का यही अर्थ है कि अब पूर्णा को आश्रय मिल गया; लेकिन क्या यह व्यंग्य नहीं हो सकता?

दाननाथ ने कुछ लज्जित होकर कहा----अब मुझे ऐसा जान पड़ता है कि अमृतराय पर मेरा सन्देह बिल्कुल मिथ्या था। मैंने आँखें बन्द करके कमलाप्रसाद की प्रत्येक बात को वेद-वाक्य समझ लिया था। मैंने अमृतराय पर कितना बड़ा अन्याय किया है, इसका अनुभव अब मैं कुछ-कुछ कर सकता हूँ। मैं कमलाप्रसाद की आँखों से देखता था। इस धूर्त ने मुझे बड़ा चकमा दिया। न-जाने मेरी बुद्धि पर क्यों ऐसा परदा पड़ गया कि अपने अनन्य मित्र पर ऐसे सन्देह करने लगा?

प्रेमा के मुख-मंडल पर स्नेह का जैसा गहरा रंग इस समय दिखाई

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