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पृष्ठ:प्रतिज्ञा.pdf/९७

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प्रतिज्ञा

स्वभाव किसी के माथे पर नहीं लिखा होता। जिन्हें तुम बड़ा संयमी समझती हो, वह छिपे रुस्तम होते हैं। उनका तीर मैदान में नहीं, घर में चलता है; मगर हाँ, इनमें एक बात अच्छी है। अगर आज बीमार पड़ जाऊँ, तो सारा क्रोध हवा हो जाय। दौड़े चले आवें; फिर दुत्कारो भी तो न हटें।

पूर्णा--तो आज क्यों नहीं बीमार पड़ जाती?

सुमित्रा--जरा दो-चार दिन जला तो लूँ । अकेले लाला को नींद नहीं आती, करवटें बदलकर सबेरा करते होंगे। इसी से तो यह मुझे जाने नहीं देते।

पूर्णा--बड़ी निर्दयी हो बहन, आज चली जाना, तुम्हें मेरी क़सम।

पर सुमित्रा इतनी आसानी से माननेवाली न थी। आज की रात भी यों ही गुज़र गई। पूर्णा सारी रात आहट लेती रही। कमलाप्रसाद न आये। इसी तरह कई दिन गुज़र गये। सुमित्रा को अब कमलाप्रसाद की चर्चा करते दिन बीतता था। उनकी सारी बुराइयाँ, उसे विस्मृत होती जाती थीं--सारे गिले और शिकवे भूलते जाते थे। वह उनकी स्नेहमयी बातें याद कर करके रोती थीं; पर अभी तक मान का बन्धन न टूटा था। क्षुधा से व्याकुल होने पर भी क्या किसी के सामने हाथ फैलाना सहज है? रमणी का हृदय अपनी पराजय स्वीकार न कर सकता था!

दस-बारह दिन बीत गये थे। एक दिन आधी रात के बाद पूर्णा को सुमित्रा के कमरे का द्वार खुलने की आहट मिली। उसने समझा शायद कमलाप्रसाद आये हैं। अपने द्वार पर खड़ी होकर झाँकने लगी।

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