(१३)
यह मेला चार पांच दिनों तक होता था जिसमें अन्तिम दिन मंगल का उत्सव ही इसके नामकरण का हेतु था। इस मेले में दूर दूर के संगीत और नृत्य विशारद पाकर सम्मिलित होते थे, संगीत का जिन्हें पूर्ण परिज्ञान रहता था। प्रेमघनजी के शब्दों में "उस मजलिस में यह न था कि तायफ़ा खड़ी होकर मनमाना जो चाहे नाच गाकर समय बिताये चरञ्च गाने में समय के अनुकूल राग रागिनी सच्चे स्वर और साँचे में ढली लय में होनी तो आवश्यक ही है आगे तान वाजी और गले के दम खम का दिखलाना तो योग्यतानुसार प्रसन्नताका हेतु है।"
मंगलायतनो हरिः वाली नौका का वर्णन, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कच्छे का वर्णन है और उस पर विराजमान उनकी अन्तरंग मंडली है। प्रेमधन जी के शब्दों में उस मंडली की स्मृति "बहुतेरा चाहते हैं कि उन बातों को अब भूल जाँय पर जिह्वा सभी अवसरों पर कुछ न कुछ उसी मंडली की चर्चा छेड़ बैठती है" के रूप में हमें उसके हृदयग्राही रूप का परिचय हेती है।
इस लेख का दूसरा अध्याय संवत् १९५० वैक्रमीय के नागरी नीरद में प्रकाशित अंश है। जिसमें वल्लभकुल भूषण कांकरौली के श्रीमान् महाराज श्री बालकृष्णलाल जी के मेले का है, जहाँ पर प्रेमघन जी से उनका साक्षात् प्रथमवार हुआ है। कितना मधुर स्मरण है "जिनके चेलों की आनन्द गोष्ठी का आनन्द पाकर चित्त अपनी ऐसी सम्मति स्थिर किए है कि उनके गुरुश्रों के इस वृहद् श्रायोजन की शोभा भी देख लेना परम आवश्यक जान पड़ा। इस मेले में महाराज काशिराज से लेकर मदनपुरा के जुलाहों तथा श्मशान घाट के डोमरों की नावें "कोई पटैलों पर बाँसों का ठाट ठाटे, तो कोई घटहा पाटे, कोई बजड़े पर झाड़ फनूस जलाये, तो कोई मोर पंखी सजाये, कोई कट्टर भिड़ाये, तो कोई पनसुही दौड़ाये घूम घूम कर मेला देखते थे।"
इस लेख में प्रेमघनजी ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को कितनी सजीवता तथा पटुता से प्रदर्शित किया है स्पष्ट है। यह उनके व्यक्तिगत निबन्ध ऐतिहासिक तथ्यों से युक्त साहित्यिक और यथार्थ प्रवन्ध है।
दिल्ली दरबार में मित्र मंडली के यार
यह लेख भारत सम्राट एडवर्ड सात के राज्याभिषेक के प्रसंग में हुए