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प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ


गया गरदन पर चढ़ बैठता; लेकिन आज मैं उसे कितनी आसानी से धोखा दिये चला जाता था। गधा है! सारी बातें भूल गया।

सहसा गुल्ली फिर डण्डे में लगी और इतने जोर से लगी जैसे बंदूक छूटी हो। इस प्रमाण के सामने अब किसी तरह की धाँधली करने का साहस मुझे इस वक्त भी न हो सका, लेकिन क्यों न एक बार सच को झूठ बताने की चेष्टा करूँ? मेरा हरज ही क्या है। मान गया, तो वाह-वाह, नहीं तो दो-चार हाथ पदना ही तो पड़ेगा। अँधेरे का बहाना करके जल्दी से गला छूड़ा लूँगा। फिर कौन दाँव देने आता है!

गया ने विजय के उल्लास से कहा-लग गयी, लग गयी! टन-से बोली!

मैंने अनजान बनने की चेष्टा करके कहा-तुमने लगते देखा? मैंने तो नहीं देखा।

'टन से बोली है सरकार!'

'और जो किसी ईट में लग गयी हो!

मेरे मुख से यह वाक्य उस समय कैसे निकला; इसका मुझे खुद आश्चर्य है। इस सत्य को झुठलाना वैसा ही था जैसे दिन को रात बताना। हम दोनों ने गुल्ली को डण्डे में जोर से लगते देखा था लेकिन गया ने मेरा कथन स्वीकार कर लिया।

'हाँ, किसी ईंट में लग गयी हो। डण्डे में लगती, तो इतनी आवाज न आती।

मैंने फिर पदाना शुरू कर दिया। लेकिन इतनी प्रत्यक्ष धाँधली कर लेने के बाद, गया की सरलता पर मुझे दया आने लगी; इसलिए जब तीसरी बार गुल्ली डण्डे में लगी, ती मैंने बड़ी उदारता से दाँव देना तय किया।

गया ने कहा-अब तो अँधेरा हो गया है भैया, कल पर रखो।