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100 : प्रेमचंद रचनावली-5
 


रुपये में तुम्हारा काम चल जाएगा?

रमा ने सिर झुकाकर कहा-हां, इतने बहुत हैं।

टिकट बाबू को किराया देकर रमा सोचने लगा-यह बूढ़ा कितना सरल, कितना परोपकारी, कितना निष्कपट जीव है। जो लोग सभ्य कहलाते हैं, उनमें कितने आदमी ऐसे निकलेंगे, जो बिना जान-पहचान किसी यात्री को उबार लें। गाड़ी के और मुसाफिर भी बूढ़े को श्रद्धा के नेत्रों से देखने लगे।

रमा को बूढे की बातों से मालूम हुआ कि वह जाति का खटिक है, कलकत्ते में उसकी शाक-भाजी की दुकान है। रहने वाला तो बिहार का है, पर चालीस साल से कलकत्ते ही में रोजगार कर रहा है। देवीदीन नाम है, बहुत दिनों से तीर्थयात्रा की इच्छा थी, बदरीनाथ की यात्रा करके लौटा जा रहा है।

रमा ने आश्चर्य से पूछा-तुम बदरीनाथ की यात्रा कर आए? वहां तो पहाड़ों की बड़ी-बड़ी चढ़ाइयां हैं।

देवीदीन-भगवान् की दया होती है तो सब कुछ हो जाता है, बाबूजी । उनकी दया चाहिए।

रमानाथ-तुम्हारे बाल-बच्चे तो कलकत्ते ही में होंगे?

देवीदीन ने रूखी हंसी हंसकर कहा–बाल-बच्चे तो सब भगवान् के घर गए। चार बेटे थे। दो का ब्याह हो गया था। सब चल दिए। मैं बैठा हुआ हूं। मुझी से तो सब पैदा हुए थे। अपने बोए हुए बीज को किसान ही तो काटता है।

यह कहकर वह फिर हंसा। जरा देर बाद बोला–बुढ़िया अभी जीती हैं। देखें, हम दोनों में पहले कौन चलता है। वह कहती है, पहले मैं जाऊंगी, मैं कहता हूं ,पहले मैं जाऊंगा। देखो किसकी टेक रहती है। बन पड़ा तो तुम्हें दिखाऊंगा। अब भी गहने पहनती है। सोने की बालियां और सोने की हसली पहने दुकान पर बैठी रहती है। जब कहा कि चल तीर्थ कर आवें तो बोली-तुम्हारे तीर्थ के लिए क्या दुकान मिट्टी में मिला दें? यह है जिंदगी का हाल। आज मरे कि कल मरे, मगर दुकान न छोड़ेगी। न कोई आगे, न कोई पीछे, न कोई रोने वाला, न कोई हंसने वाला, मगर माया बनी हुई है।अब भी एक-न-एक गहना बनवाती ही रहती है। न जाने कब उसका पेट भरेगा। सब घरों का यही हाल है। जहां देखोहाय गहने । हाय गहने | गहने के पीछे जान दे दें, घर के आदमियों को भूखा मारें, घर की चीजें बेचें। और कहां तक कहूं, अपनी आबरू तक बेच दें। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सबको यही रोग लगा हुआ है। कलकत्ते में कहां काम करते हो, भैया?

रमानाथ-अभी तो जा रहा हूं। देखें कोई नौकरी-चाकरी मिलती है या नहीं?

देवीदीन–तो फिर मेरे ही घर ठहरना। दो कोठरियां हैं, सामने दालान है, एक कोठरी ऊपर है। आज बेचूं तो दस हजार मिलें। एक कोठरी तुम्हें दे दूंगा। जब कहीं काम मिल जाय, तो अपना घर ले लेना। पचास साल हुए घर से भागकर हबड़े गया था, तब से सुख भी देखे, दुख भी देखे। अब मना रहा हूं, भगवान् ले चलो। हां, बुढिया को अमर कर दो। नहीं, तो उसकी दुकान कौन लेगा, घर कौन लेगा और गहने कौन लेगा।

यह कहकर देवीदीन फिर हंसा। वह इतना हसोड़, इतनी प्रसन्नचित्त था कि, रमा को आश्चर्य हो रहा था। बेबात की बात पर हंसता था। जिस बात पर और लोग रोते हैं, उस पर उसे