पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/१३४

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134 : प्रेमचंद रचनावली-5
 

रतन ने प्रसन्न होकर कहा-इससे बढ़कर क्या बात होगी। मैं तो ईश्वर से मनाती हूं कि तुम्हारी बीमारी मुझे दे दें।

'शाम को घूम आया करो। अगर बीमार पड़ने की इच्छा हो, तो मेरे अच्छे हो जाने पर पड़ना।'

'कहां जाऊ, मेरा तो कहीं जाने को जी ही नहीं चाहता। मुझे यहीं सबसे अच्छा लगता वकील साहब को एकाएक रमानाथ का खयाल आ गया। बोले-जरा शहर के पार्को में घूम-घाम कर देखो, शायद् रमानाथ का पता चल जाय।

रतन को अपना वादा याद आ गया। रमा को पा जाने की आनंदमय आशा ने एक क्षण के लिए उसे चंचल कर दिया। कहीं वह पार्क में बैठे मिल जाएं, तो पूछू कहिए बाबूजी, अब कहां भागकर जाइएगा? इस कल्पना से उसकी मुद्रा खिल उठी। बोली-जालपा से मैंने वादा तो किया था कि पता लगाऊगी; पर यहां आकर भूल गई।

वकील साहब ने साग्रह कहा-आज चली जाओ। आज क्या, शाम को रोज घंटे भर के लिए निकल जाया करो।

रतन ने चिंतित होकर कहा–लेकिन चिंता तो लगी रहेगी।

वकील साहब ने मुस्कराकर कहा-मेरी? मैं तो अच्छा हो रहा है।

रतन ने संदिग्ध भाव से कहा-अच्छा, चली जाऊंगी। रतन को कल से वकील साहब के आश्वासने पर कुछ संदेह होने लगा था। उनकी चेष्टा से अच्छे होने का कोई लक्षण उसे न दिखाई देता था। इनका चेहरा क्यों दिन-दिन पीला पड़ता जाता है। इनकी आंखें क्यों हरदम बंद रहती हैं 'देह क्यों दिन-दिन घुलती जाती है । महराज और कहार से वह यह शंका न कह सकती थी। कविराज से पूछते उसे संकोच होता था। अगर कहीं रमा मिल जाते, तो उनसे पूछती। वह इतने दिनों से यहां हैं, किसी दूसरे डॉक्टर को दिखाती। इन कविराज जी से उसे कुछ-कुछ निराश हो चली थी।

जब रतन चली गई, तो वकील साहब ने टीमल से कहा-मुझे जरा उठाकर बिठा दो,टीमल। पड़े-पड़े कमर सीधी हो गई। एक प्याली चाय पिला दो। कई दिन हो गए, चाय की सूरत नहीं देखी। यह पथ्य मुझे मार डालता है। दूध देखकर ज्वर चढ़ आता है, पर उनकी खातिर से पी लेता हूं। मझे तो इन कविराज की दवा से कोई फायदा नहीं मालूम होता। तुम्क्या मालूम होता है?

टीमल ने वकील साहब को तकिए के सहारे बैठाकर कहा–बाबूजी सो देख लेव, यह तो मैं पहले ही कहने वाला था। सो देख लेवे, बहूजी के डर के मारे नहीं कहता था।

वकील साहब ने कई मिनट चुप रहने के बाद कहा-मैं मौत से डरता नहीं, टीमल !बिल्कुल नहीं। मुझे स्वर्ग और नरक पर बिल्कुल विश्वास नहीं है। अगर संस्कारों के अनुसार आदमी को जन्म लेना पड़ता है, तो मुझे विश्वास है, मेरा जन्म किसी अच्छे घर में होगा। फिर भी मरने को जी नहीं चाहता। सोचता हूं, मर गया तो क्या होगा।

टीमल ने कहा-बाबूजी सो देख लेव, आप ऐसी बातें न करें। भगवान् चाहेंगे, तो आप अच्छे हो जाएंगे। किसी दूसरे डाक्टर को बुलाऊं? आप लोग तो इंग्रेजी पढ़े हैं, सो देख लेव,कुछ मानते ही नहीं, मुझे तो कुछ और ही संदेह हो रहा है। कभी-कभी गंवारों को भी सुन लिय