पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/१३७

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गबन : 137
 


भोजन के लिए पूछने आया। भोजन भी ऐसी चीज है, जिसे कोई छोड़ सके । वह रसोई में जाकर महराज से बोली-तुम लोग खा लो, महराज ! मुझे आज भूख नहीं लगी है।

महराज ने आग्रह किया-दो ही फुलके खा लीजिए, सरकार !

रतन ठिठक गई। महराज के आग्रह में इतनी सहृदयता, इतनी संवेदना भरी हुई थी कि रतन को एक प्रकार की सांत्वना का अनुभव हुआ। यहां कोई अपना नहीं है, यह सोचने में उसे अपनी भूल प्रतीत हुई। महराज ने अब तक रतन को कठोर स्वामिनी के रूप में देखा था। वहीं स्वामिनी आज उसके सामने खड़ी मानो सहानुभूति की भिक्षा मांग रही थी। उसकी सारी सद्वृत्तियां उमड़ उठीं। रतन को उसके दुर्बल मुख पर अनुराग का तेज नजर आया।

उसने पूछा-क्यों महराज, बाबूजी को इस कविराज की दवा से कोई लाभ हो रहा है?

महराज ने डरते-डरते वही शब्द दुहरा दिए, जो आज वकील साहब से कहे थे-कुछ-कुछ तो हो रहा है, लेकिन जितना होना चाहिए उतनी नहीं।

रतन ने अविश्वास के अंदाज से देखकर कहा-तुम भी मुझे धोखा देते हो, महराज।

महराज की आंखें डबडबा गईं। बोले-भगवान् सब अच्छा ही करेंगे बहूजी, घबड़ाने से क्या होगा। अपना तो कोई बस नहीं है।

रतन ने पूछा-यहां कोई ज्योतिषी न मिलेगा? जरा उससे पूछते। कुछ पूजा-पाठ भी कर लेने से अच्छा होता है।

महराज ने तुष्टि के भाव से कहा-यह तो मैं पहले ही कहने वाला था, बहुजी । लेकिन बाबूजी का मिजाज तो जानती हो। इन बातों से वह कितना बिगड़ते हैं।

रतन ने दृढ़ता से कहा-सवेरे किसी को जरूर बुला लाना।

'सरकार चिढ़ेंगे।'

'मैं तो कहती हूं।'

यह कहती कमरे में आई और रोशनी के सामने बैठकर जालपा को पत्र लिखने लगी-

'बहन, नहीं कह सकती, क्या होने वाला है। आज मुझे मालूम हुआ है कि मैं अब तक मीठे भ्रम में पड़ी हुई थी। बाबूजी अब तक मुझसे अपनी दशा छिपाते थे, म आज यह बात उनके काबू से बाहर हो गई। तुमसे क्या कहें, आज वह वसीयत लिखने की चर्चा कर रहे थे। मैंने ही टाला। दिल घबड़ा रहा है बहन, जी चाहता है, थोड़ी-सी संखिया खाकर सो रहूं। विधाता को संसार दयालु, कृपालु, दोन-बंधु और जाने कौन-कौन-सी उपाधियां देता है। मैं कहती हूं, उससे निर्दयी, निर्मम, निष्ठुर कोई शत्रु भी नहीं हो सकता। पूर्वजन्म का संस्कार केवल मन को समझाने की चीज है। जिस दंड का हेतु ही हमें न मालूम हो, उस दंड का मूल्य ही क्या । वह तो जबर्दस्त की लाठी है, जो आघात करने के लिए कोई कारण गढ़ लेती है। इस अंधेरे, निर्जन, कांटों से भरे हुए जीवन-मार्ग में मुझे केवल एक टिमटिमाता हुआ दीपक मिला था। मैं उसे अंचल में छिपाए, विधि को धन्यवाद देती हुई, गाती चली जाती थी; पर वह दीपक भी मुझसे छीना जा रहा है। इस अंधकार में मैं कहां जाऊ, कौन मेरा रोना सुनेगा, कौन मेरी बांह पकड़ेगा।'

‘बहन, मुझे क्षमा करना। मुझे बाबूजी का पता लगाने का अवकाश नहीं मिला। आज कई पार्क का चक्कर लगा आई, पर कहीं पता नहीं चला। कुछ अवसर मिला तो फिर जाऊंगी।'