पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/३४

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34 : प्रेमचंद रचनावली-5
 



खाते हैं। फिर एक को तीस रुपये और दूसरे को तीन सौ रुपये क्यों देते हो?

रमा का फर्जी पिट गया, रमेश बाबू ने बड़े जोर से कहकहा मारा।

रमा ने रोष के साथ कहा-अगर आप चुपचाप खेलते हैं तो खेलिए,नहीं मैं जाता हूं। मुझे बातों में लगाकर सारे मुहरे उड़ा लिए।

रमेश–अच्छा साहब, अब बोलू तो जबान पकड़ लीजिए। यह लीजिए शह | तो तुम कल अर्जी दे दो। उम्मीद तो है, तुम्हें यह जगह मिल जाएगी; मगर जिस दिन जगह मिले, मेरे साथ रात भर खेलना होगा।

रमानाथ-आप तो दो ही मातों में रोने लगते हैं।

रमेश-अजी वह दिन गए, जब आप मुझे मात दिया करते थे। आजकल चन्द्रमा बलवान हैं। इधर मैंने एक मंत्र सिद्ध किया है। क्या मजाल कि कोई मात दे सके। फिर शह।

रमानाथ जी तो चाहता है, दूसरी बाजी मात देकर जाऊं, मगर देर होगी।

रमेश—देर क्या होगी। अभी तो नौ बजे हैं। खेल लो, दिल का अरमान निकल जाय। यह शह और मात !

रमानाथ-अच्छा कल की रहीं। कल ललकार कर पांच मानें न दी हों तो कहिएगा।

रमेश-अजी जाओ भी, तुम मुझे क्या मात दोगे । हिम्मत हो, तो अभी सहीं ।

रमानाथ-अच्छा आइए, आप भी क्या कहेंगे, मगर मैं पांच बाजियों से कम न खेलूंगा।

रमेश–पांच नहीं, तुम दस खेलो जी। रात तो अपनी है। तो चलो फिर खाना खा लें। तब निश्चित होकर बैठे। तुम्हारे घर कहलाए देता हूं कि आज यहीं सोएँगे, इंतजार न करें।

दोनों ने भोजन किया और फिर शतरंज पर बैठे। पहली बाजी में ग्यारह बज गए। रमेश बाबू की जीत रही। दूसरी बाजी भी उन्हीं के हाथ रही। तीसरी बाजी खत्म हुई तो दो बज गए।

रमानाथ-अब तो मुझे नींद आ रही है।

रमेश–तो मुंह धो डालो, बरफ रक्खी हुई है। मैं पांच बाजियां खेले बगैर सोने न देंगी।

रमेश बाबू को यह विश्वास हो रहा था कि आज मेरा सितारा बुलंद है। नहीं तो रमा को लगातार तीन मात देना आसान न था। वह समझ गए थे, इम वक्त चाहे जितनी बाजियां खेलूं,जीत मेरी ही होगी, मगर जब चौथी बाजी हार गए, तो यह विश्वास जाता रहा। उलटे यह भय हुआ कि कहीं लगातार हारता न जाऊं।

बोले-अब तो सोना चाहिए।

रमानाथ-क्यों, पांच बाजियां पूरी न कर लीजिए?

रमेश-कले दफ्तर भी तो जाना है।

रमा ने अधिक आग्रह न किया। दोनों सोए।

रमा यों ही आठ बजे से पहले न उठता था, फिर आज तो तीन बजे सोया था। आज तो उसे दस बजे तक सोने का अधिकार था। रमेश नियमानुसार पांच बजे उठ बैठे, स्नान किया, संध्या की, घूमने गए और आठ बजे लौटे, मगर रमा तब तक सोता ही रहा। आखिर जब साढ़े नौ बजे गए तो उन्होंने उसे जगाया।

रमा ने बिगड़कर कहा-नाहक जगा दिया, कैसी मजे की नींद आ रही थी।

रमेश-अजी वह अर्जी देना है कि नहीं तुमको?

रमानाथ-आप दे दीजिएगा।