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पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४८१

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कर्मभूमि:481
 

तुम खूब आए दोस्त, अब मुझे यकीन आ गया कि ईश्वर हमारे साथ है। सुखदा भी तो यहीं है, जनाने जेल में। मुन्नी भी आ पहुंची। तुम्हारी कसर थी, वह भी पूरी हो गई। मैं दिल में समझ रहा था, तुम भी एक-न-एक दिन आओगे, पर इतनी जल्दी आओगे, यह उम्मीद ने थी। वहां की ताजा खबरें सुनाओ। कोई हंगामा तो नहीं हुआ? सलीम ने व्यंग्य से कहा-जी नहीं, जरा भी नहीं। हंगामे को कोई बात भी हो? लो मजे से खा रहे हैं और फग गा रहे हैं। आप यहां आराम से बैठे हुए हैं न? उसने थोड़े-से शब्दों में वहां की सारी परिस्थिति कह सुनाई-मवेशियों का कुर्क किया जाना, कसाइयों का आना, अहीरों के मुहाल में गोलियों का चलना । घोष को पटककर मारने की कथा उसने विशेष रुचि से कही। अमरकान्त का मुंह लटक गया--तुमने सरासर नादानी की। और आप क्या समझते थे, कोई पंचायत हे, जहां शराब और हुक्के के साथ सारा फैसला हो जाएगा? मगर फरियाद तो इस तरह नहीं की जाती? | हमने तो कोई रियत नही चाही थी। ग्आियत तो थी ही। जब तुमने एक शर्त पर जमीन ली तो इंसाफ यह कहता है कि वह शर्त पर क टावर की शर्त पर किसान ने अमीन नहीं जोर्त! था, बल्कि सान्नाना लगान की शर्त पर। जमींदार या सरकार को पैदावार की कमी वेशी से कोई सरोकार नहीं है। | "जय पैदावार के महंग हो जाने पर नगान बढ़ा दिया जाता है तो कोई वजह नहीं कि पैदावार के मस्त हो जाने पर घटा न दिया जाय। मंदी में नजी का लगान वमून्न करना सरासर बेइंसाफी हैं। "मगर लगान लाठी के भर में तो नहीं बढ़ाया जाना, उम्मके लिए भी तो कानून हैं?'। सन्नीम को विस्मय हो रहा था सी भयानक परिस्थिति मुनकर भी अमर इतना शांत कैमे बैठा हुआ है। इसी दशा में उसने यह खवरं सुनो होती, ती शायद उसका खून खौल उठता और वह आपे से बाहर हो जाता। अवश्य ही अमर जेल में आकर दर्ज 7 27 है। ऐसी दशा में उसने उन तैयारियों को उससे छिपाना ही उचित समझा, जो आजकल न का मुकाबला करने के लिए की जा रही थीं। अमर उसके जवाब की प्रतीक्षा कर रहा था। जब सलीम ने काई जवाब न दिया, तो उसने पूछा--तो आजकल वहां कोन है? स्वामीजी हैं? सलीम ने सकुचाते हुए कहा–स्वामीजी तो शायद पकड़े गए। मेरे बाद ही वहां सुकीना पहुंच गई। “अच्छा । सकीना भी परदे से निकल आई? मुझे तो उससे ऐसी उम्मीद न थी।

    • तो क्या तुमने समझा था कि आग लगाकर तुम उसे एक दायरे के अंदर रोक लोगे?"

अमर ने चिंतित होकर कहा-मैंने तो यही समझा था कि हमने हिंसा भाउ को लगाम दे दी है और वह काबू से बाहर नहीं हो सकता। आप आजादी चाहते हैं, मगर उसकी कीमत नहीं देना चाहते। | "आपने जिस चीज को आजादी की कीमत समझ रखा है, वह उसकी कीमत नहीं है। उसकी कीमत है-हक और सच्चाई पर जमे रहने की ताकत।