पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/७५

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गबन : 75
 


इसकी कसर तब निकल जायगी।

इतने में गोपी भी लौटा। रमेश ने लिखा था- मैंने अपने जीवन में दो-चार नियम बना लिए हैं। और बड़ी कठोरता से उनका पालन करता हूं। उनमें से एक नियम यह भी है कि मित्रों से लेन-देन का व्यवहार न करूंगा। अभी तुम्हें अनुभव नहीं हुआ है, लेकिन कुछ दिनों में हो जाएगा कि जहां मित्रों से लेन-देन शुरू हुआ, वहां मनमुटाव होते देर नहीं लगती। तुम मेरे प्यारे दोस्त हो, मैं तुमसे दुश्मनी नहीं करना चाहती। इसलिए मुझे क्षमा करो।

रमा ने इस पत्र को भी फाड़कर फेंक दिया और कुर्सी पर बैठकर दीपक की ओर टकटकी बांधकर देखने लगा। दीपक उसे दिखाई देता था, इसमें संदेह है। इतनी ही एकाग्रता से वह कदाचित आकाश की काली, अभेद्य मेघ-राशि की ओर ताकता । मन की एक दशा वह भी होती है, जब आंखें खुली होती हैं और कुछ नहीं सूझता; कान खुले रहते हैं और कुछ नहीं सुनाई देता।

अठारह

संध्या हो गई थी म्युनिसिपैलिटी के अहाते में सन्नाटा छा गया था। कर्मचारी एक-एक करके जा रहे थे। मेहतर कमरों में झाडू लगा रहा था। चपरासियों ने भी जूते पहनना शुरू कर दिया था खोंचेवाले दिनभर की बिक्री के पैसे गिन रहे थे। पर रमानाथ अपनी कुर्सी पर बैठा रजिस्टर लिख रहा था। आज भी वह प्रात:काल आया था, पर आज भी कोई बड़ा शिकार न फंसा, वही दस रुपये मिलकर रह गए। अब अपनी आबरू बचाने का उसके पास और क्या उपाय था ! रमा ने रतन को झांसा देने की ठान ली। वह खूब जानता था कि रतन को यह अधीरता केवल इसलिए है कि शायद उसके रुपये मैंने खर्च कर दिए। अगर उसे मालूम हो जाए कि उसके रुपये तत्काल मिल सकते हैं, तो वह शांत हो जाएगी। रमा उसे रुपये से भरी हुई थैली दिखाकर उसका संदेह मिटा देना चाहता था। वह खजांची साहब के चले जाने की राह देख रहा है। उसने आज जान- बूझकर देर की थी। आज की आमदनी के आठ सौ रुपये उसके पास थे। इसे वह अपने घर ले जाना चाहता था। खजांची ठीक चार बजे उठा। उसे क्या गरज थी कि रमा से आज की आमदनी मांगता। रुपये गिनने से ही छुट्टी मिली। दिनभर वहीं लिखते-लिखते और रुपये गिनते-गिनते बेचारे की कमर दुख रही थी। रमा को जब मालूम हो गया कि खजांची साहब दूर निकल गए होंगे, तो उसने रजिस्टर बंद कर दिया और चपरासी से बोला-थैली उठाओ । चलकर जमा कर आएं।

चपरासी ने कहा-खजांची बाबू तो चले गए ।

रमा ने आंखें फाड़कर कहा-खजांची बाबू चले गए ! तुमने मुझसे कहा क्यों नहीं? अभी कितनी दूर गए होंगे?

चपरासी-सड़क के नुक्कड़ तक पहुंचे होंगे।

रमानाथ-यह आमदनी कैसे जमा होगी?

चपरासी–हुकुम हो तो बुला लाऊं?