पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/७६

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76 : प्रेमचंद रचनावली-5
 

रमानाथ-अजी, जाओ भी, अब तक तो कहा नहीं, अब उन्हें आधे रास्ते से बुलाने जाओगे। हो तुम भी निरे बछिया के ताऊ। आज ज्यादा छान गए थे क्या? खैर रुपये इसी दराज में रखे रहेंगे। तुम्हारी जिम्मेदारी रहेगी।

चपरासी-नहीं बाबू साहब, मैं यहां रुपया नहीं रखने दूंगा। सब घड़ी बराबर नहीं जाती। कहीं रुपये उठ जायं, तो मैं बेगुनाह मारा जाऊं। सुभीते का ताला भी तो नहीं है यहां।

रमानाथ–तो फिर ये रुपये कहां रक्खें?

चपरासी-हुजूर, अपने साथ लेते जाएं।

रमा तो यह चाहता ही था। एक इक्का मंगवाया, उस पर रुपयों की थैली रक्खी और घर चला। सोचता जाता था कि अगर रतन भभकी में आ गई, तो क्या पूछना कह दूंगा, दो-ही चार दिन की कसर है। रुपये सामने देखकर उसे तसल्ली हो जाएगी।

जालपा ने थैली देखकर पूछा-क्या कंगन न मिला?

रमानाथ-अभी तैयार नहीं था, मैंने समझा रुपये लेता चलं जिसमें उन्हें तस्कीन हो जाय।

जालपा-क्या कहा सराफ ने?

रमानाथ–कहा क्या, आज-कल करता है। अभी रतन देवी आई नहीं?

जालपा-आती ही होगी, उसे चैन कहां?

जब चिराग जले तक रतन न आई, तो रमा ने समझा अब न आएगी। रुपये आलमारी में रख दिए और घूमने चल दिया। अभी उसे गए दस मिनट भी न हुए होंगे कि रतन आ पहुंची और आते-ही-आते बोली-कंगन तो आ गए होंगे?

जालपा–हां आ गए हैं, पहन लो । बेचारे कई दफा सराफ के पास गए। अभाग देता ही नहीं, हीले-हवाले करता है।

रतन-कैसा सराफ है कि इतने दिन से होले-हवाले कर रहा है। मैं जानती कि रुपये झमेले में पड़ जाएंगे, तो देती ही क्यों न रुपये मिलते हैं, ने कंगन मिलता हैं ।

रतन ने यह बात कुछ ऐसे अविश्वास के भाव से कही कि जालपा जल उठी। गर्व से बोली-आपके रुपये रखे हुए हैं, जब चाहिए ले जाइए। अपने बस की बात तो है नहीं। आखिर जब सराफ देगा, तभी तो लाएंगे?

रतन-कुछ वादा करता है, कब तक देगा?

जालपा-उसके वादों का क्या ठीक, सैकड़ों वादें तो कर चुका है।

रतन-तो इसके मानी यह हैं कि अब वह चीज न बनाएगा?

जालपा-जो चाहे समझ लो।

रतन-तो मेरे रुपये ही दे दो, बाज आई ऐसे कंगन से।

जालपा झमककर उठी, आल्मारी में थैली निकाली और रतन के सामने पटककर बोली-ये आपके रुपये रखे हैं, ले जाइए।

वास्तव में रतन की अधीरता का कारण वहीं था, जो रमा ने समझा था। उसे भ्रम हो रहा था कि इन लोगों ने मेरे रुपये खर्च कर डाले। इसीलिए वह बार-बार कंगन को तकाजा करती थी। रुपये देखकर उसका भ्रम शांत हो गया। कुछ लज्जित होकर बोली-अगर दो-चार दिन में देने का वादा करता हो तो रुपये रहने दो।