पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/९९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
गबन : 99
 


रमानाथ–यही तो मुश्किल है। मेरे पास पचास का नोट था। खिड़की पर बड़ी भीड़ थी। मैंने नोट उस जमादार को टिकट लाने के लिए दिया; पर वह ऐसा गायब हुआ कि लौटा ही नहीं। शायद आप उसे पहचानते हों। लंबी-लंबा चेचक-रू आदमी है।

टिकट बाबू-इस विषय में आप लिखा-पढी कर सकते हैं, मगर बिना टिकट के जा नहीं सकते।

रमा ने विनीत भाव से कहा- भाई साहब, आपसे क्या छिपाऊं। मेरे पास और रुपये नहीं हैं। आप जैसा मुनासिब समझें, करें।

टिकट बाबू-मुझे अफसोस है, बाबू साहब, कायदे से मजबूर हूं। कमरे के सारे मुसाफिर आपस में कानाफूसी करने लगे। तीसरा दर्जा था, अधिकांश मजदूर बैठे हुए थे जो मजूरी की टोह में पूरब जा रहे थे। वे एक बाबू जाति के प्राणी को इस भाँति अपमानित होते देखकर आनंद पा रहे थे। शायद टिकट बाबू ने रमा को धक्का देकर उतार दिया होता, तो और भी खुश होते। रमा को जीवन में कभी इतनी झेप न हुई थी। चुपचाप सिर झुकाए खड़ा था। अभी तो जीवन की इस नई यात्रा का आरंभ हुआ है। न जाने आगे क्या-क्या विपत्तियां झेलनी पड़ेगी। किस-किसके हाथों धोखा खाना पड़ेगा। उसके जी में आया-गाड़ी से कूद पड़ू, इस छीछालेदार से तो मर जाना ही अच्छी। उसकी आंखें भर आई, उसने खिड़की से सिर बाहर निकाल लिया और रोने लगा।

सहसा एक बूढ़े आदमी ने, जो उसके पास ही बैठा हुआ था, पूछा-कलकत्ते में कहाँ जाओगे, बाबूजी?

रमा ने समझा, वह गंवार मुझे बना रहा है, झुंझलाकर बोला-तुमसे मतलब, मैं कहीं जाऊंगा ।

बूढे ने इसे उपेक्षा पर कुछ भी ध्यान न दिया, बोला-मैं भी वहीं चलूंगा। हमारा-तुम्हारा साथ हो जायगा। फिर धीरे से बोला-किराए के रुपये मुझसे ले लो, वहां दे देना।

अब रमा ने उसकी ओर ध्यान से देखा। कोई साठ-सत्तर साल का बूढ़ा घुला हुआ आदमी था। मांस तो क्या हड्डियां तक गल गई थीं। मूंछ और सिर के बाल मुड़े हुए थे। एक छोटी-सी बकुची के सिवा उसके पास कोई असबाब भी न था।

रमा को अपनी ओर ताकते देखकर वह फिर बोला-आप हबड़े हीं उतरेंगे या और कहीं जाएंगे?

रमा ने एहसान के भार से दबकर कहा-बाबा, आगे मैं उतर पडूगा। रुपये का कोई बंदोबस्त करके फिर आऊंगा।

बूढा-तुम्हें कितने रुपये चाहिए, मैं भी तो वहीं चल रहा है। जब चाहे दे देना। क्या मेरे दस-पांच रुपये लेकर भाग जाओगे। कहां घर है?

रमानाथ-यहीं, प्रयाग ही में रहता हूँ।

बूढ़े ने भक्ति के भाव से कहा-धन्य है प्रयाग । धन्य है। मैं भी त्रिवेणी का स्नान करके आ रहा हूं, सचमुच देवताओं की पुरी है। तो कै रुपये निकालें?

रमा ने सकुचाते हुए कहा-मैं चलते ही चलते रुपया न दे सकेंगा, यह समझ लो।

बूढे ने सरल भाव से कही-अरे बाबूजी, मेरे दस-पांच रुपये लेकर तुम भाग थोड़े ही जाओगे। मैंने तो देखा, प्रयाग के पण्डे यात्रियों को बिना लिखाए-पढ़ाए रुपये दे देते हैं। इस