पृष्ठ:प्रेमसागर.pdf/१२५

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
( ७७ )

कुलरीत्ति न छोड़िये, जो लोग अपना धर्म तज और का धर्म पालते हैं सो ऐसे हैं, जैसे कुलबधू हो परपुरुष से प्रीति करै। इससे अब इंद्र की पूजा छोड़ दीजै और बन पर्वन की पूजा कीजै, क्योकि हम बनबासी हैं, हमारे राजा वेई हैं जिनके राज में हम सुख से रहते हैं, तिन्हें छोड़ और को पूजना हमें उचित नहीं। इससे अब सब पकवान मिठाई अन्न ले चलो और गोवर्द्धन की पूजा करो।

इतनी बात के सुनते ही नंद उपनंद उठकर वहाँ गये जहाँ बड़े बड़े गोप अथाई पर बैठे थे। इन्होने जाते ही सब श्रीकृष्ण की कही बाते विन्हें सुनाईं। वे सुनतेही बोले कि कृष्ण सच कहता है, तुम बालक जान उसकी बात तम टालो। भला तुमहीं बिचारो कि इंद्र कौन है, और हम किस लिये विसे मानते है, जो पालता है उसकी तो पूजाही भुलाई।

हमें कहा सुरपति सो काज, पूजे अन सरिता गिरिराज।

ऐसे कह फिर सब गोपो ने कहा―

भलौ मतौ कान्हर कियौ, तजिये सिगरे देव।
गोवर्द्धन पर्वत बड़ो, ताकी कीजै सेव॥

यह बचन सुनतेही नंदजी ने प्रसन्न हो गॉव में ढँढोरा फिर वाय दिया कि कल हम सारे ब्रजबासी चलकर गोवर्द्धन की पूजा करेंगे, जिस जिसके घर में इंद्र की पूजा के लिए पकवान मिठाई बनी है सो सब ले ले भोरही गोवर्द्धन पै जाइयो। इतनी बात सुन सकल ब्रजबासी दूसरे दिन भोरके तड़के उठ, स्नान ध्यान कर, सब सामग्री झालों, परातो, थालो, डलो, हंडो, चरुओं में भर, गाडो, बहंगियो पर रखवाय गोवर्द्धन को चले। तिसी समै नंद