आँख मूँद रहा है। ऐसी कुमति ठानि एक मरा साँप वहाँ पड़ा था सो धनुष से उठा ऋषि के गले में डाल अपने घर आया। मुकुट उतारते ही राजा को ज्ञान हुआ तो सोचकर कहने लगा कि कंचन में कलियुग का बास है यह मेरे सीस पर था इसीसे मेरी ऐसी कुमति हुई जो मरा सर्प ले ऋषि के गले में डाल दिया, सो मै अब समझा कि कलियुग ने मुझसे अपना पलटा लिया। इस महापाप से मैं कैसे छूटूँगा, बरन धन जन स्त्री और राज, मेरा क्यों न गया सब आज, न जानूँ किस जन्म में यह अधर्म जायगा जो मैंने ब्राह्मन को सताया है।
राजा परीक्षित तो यहाँ इस अथाह सोचसागर में डूब रहे थे और वहाँ लोमस ऋषि थे तहाँ कितने एक लड़के खेलते हुए जा निकले, मरा साँप उनके गले में देख अचंभे रहे और घबराकर आपस में कहने लगे कि भाई, कोई इनके पुत्र से जाके कह दे जो उपबन में कौशिकी नदी के तीर ऋषियों के बालकों मे खेलता है। एक सुनते ही दौड़ा वहीं गया जहाँ शृंगी ऋषि छोकरों के साथ खेलता था। कहा—बंधु, तुम यहाँ क्या खेलते हो, कोई दुष्ट मरा हुआ काला नाग तुम्हारे पिता के कंठ में डाल गया है। सुनते ही शृंगी ऋषि के नैन लाल हो आये, दाँत पीस पीस लगा थरथर काँपने और क्रोध कर कहने कि कलियुग में राजा उपजे हैं अभिमानी धन के मद से अंधे हो गये हैं दुखदानी।
अब मैं उसको दूहूँ श्राप, वही मीच पावैगा आप।
ऐसे कह शृंगी ऋषि ने कौशिकी नदी का जल चुल्लू में ले, राजा परीक्षित को श्राप दिया कि वही सर्प सातवें दिन तुझे डसेगा।
इस भाँति राजा को सराप अपने बाप के पास आ गले से