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पृष्ठ:प्रेमसागर.pdf/५२

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साँप निकाल कहने लगा—हे पिता, तुम अपनी देह सँभालो मैंने उसे श्राप दिया है जिसने आपके गले में मरा सर्प डाला था। यह बचन सुनते ही लोमस ऋषि ने चैतन्य हो नैन उघाड़ अपने ज्ञान ध्यान से विचारकर कहा—अरे पुत्र, तूने यह क्या किया, क्यों सराप राजा को दिया, जिसके राज में थे हम सुखी कोई पशु पंछी भी न था दुखी, ऐसा धर्मराज था जिसमें सिंह गाय एक साथ रहते और आपस में कुछ न कहते। अरे पुत्र, जिनके देस में हम बसे, क्या हुआ तिनके हँसे। मरा हुआ साँप डाला था उसे श्राप क्यों दिया।

तनक दोष पर ऐसा श्राप, तैंने किया बड़ा ही पाप।

कुछ विचार मन में नहीं किया, गुन छोड़ा औगुन ही लिया

साधु को चाहिये सील सुभाव से रहे, आप कुछ न कहे, और की सुन ले, सबका गुन ले ले औगुन तज दे। इतना कह लोमस ऋषि ने एक चेले को बुलाके कहा—तुम राजा परीक्षित को जाके जता दो जो तुम्हें शृंगी ऋषि ने श्राप दिया है, भला लोग तो दोष देहींगे पर वह सुन सावधान तो हो। इतना बचन गुरू का मान चेला चला चला वहाँ आया जहाँ राजा बैठा सोच करता था। आते ही कहा—महाराज, तुम्हें शृंगी ऋषि ने यह श्राप दिया है कि सातवें दिन तक्षक डसेगा। अब तुम अपना कारज करो जिससे कर्म की फाँसी से छूटो। सुनते ही राजा प्रसन्नता से खड़ा हो हाथ जोड़ कहने लगा कि मुझ पर ऋषि ने बड़ी कृपा की जो श्राप दिया, क्योंकि मैं माया मोह के अपार सोचसागर में पड़ा था, सो निकाल बाहर किया। जब मुनि का शिष्य बिदा हुआ तब राजा ने आप तो बैराग लिया और जनमेजय को बुलाय राज