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पृष्ठ:प्रेमसागर.pdf/५७

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हैं। द्रुमलिक बोला—रानी, तू श्राप मात दे मुझे, मैंने अपने धर्म का फल दिया है तुझे। तेरी कोख बंद देख मेरे मन में बड़ी चिंता थी सो गई।

आज से हुई गर्भ की आस, लड़का होगा दसवें मास।

और मेरी देह के सुभाव से तेरा पुत्र नौ खण्ड पृथ्वी को जीत राज करेगा और कृष्ण से लड़ेगा। मेरा नाम प्रथम काल नेम था तब विष्णु से युद्ध किया था। अब जन्म ले आया तो द्रुमलिक नाम कहाया, तुझको पुत्र दे चला, तू अपने मन में किसी बात की चिंता मत करे। इतनी बात कह जब कालनेम चला गया तब रानी को भी कुछ सोच समझकर धीरज भया।

जैसी हो होतव्यता, तैसी उपजे बुद्धि।
होनहार हिरदे बसे, बिसर जाय सब सुद्धि।।

इतने में सब सखी सहेली आन मिलीं, रानी का सिंगार बिगड़ा देख एक सहेली बोल उठी—इतनी बेर तुम्हें कहाँ लग और यह क्या गति हुई। पवनरेखा ने कहा—सुनो सहेली, तुमने इस बन में तजी अकेली। एक बंदर आया विसने मुझे अधिक सताया जिसके डर से मैं अब तक थर थर काँपती हूँ। यह बात सुनकर तो सबकी सब घबराईं औ रानी को झट रथ पर चढ़ा घर लाईं। जब दस महीने पूजे तब पूरे दिनों लड़का हुआ, तिस समै एक बड़ी आँधी चली कि जिसके मारे लगी धरती डोलने, अँधेरा ऐसा हुआ जो दिनकी रात हो गई और लगे तारे टूट टूट गिरने, बादल गरजने और बिजली कड़कने।

ऐसे माघ सुदी तेरस बृहस्पति वार को कंस ने जन्म लिया। तब राजा उग्रसेन ने प्रसन्न हो सारे नगर के मंगलामुखियों को