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पृष्ठ:प्रेमसागर.pdf/६५

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तीसरा अध्याय

फेर शुकदेवजी राजा परीक्षित से कहने लगे कि राजा कैसे गर्भ में आये हरी, और ब्रह्मादिक ने गर्भस्तुति करी औ देवी जिस भाँति बलदेवजी को गोकुल ले गई, तिसी रीति से कथा कहता हूँ। एक दिन राजा कंस अपनी सभा में आय बैठा, और जितने दैत्य उसके थे विनको बुलाकर कहा―सुनो, सब देवता पृथ्वी में जन्म ले आये हैं, तिन्होमें कृष्ण भी औतार लेगा। यह भेद मुझसे नारद मुनि समझाय के कह गये हैं, इससे अब उचित यही है कि तुम जाकर सब यदुबंसियों का ऐसा नाश करो जो एक भी जीता न बचे।

यह आज्ञा पा सबके सब दंडवत कर चले, नगर में आ ढूँढ़ ढूँढ़ पकड़ पकड़ लगे बाँधने, खाते पीते, खड़े बैठे, सोते जागते, चलते फिरते, जिसे पाया तिसे न छोड़ा, घेर के एक ठौर लाये और जला जला डबो डबो पटक पटक दुख दे दे सबको मार डाला। इसी रीति से छोटे बड़े भयावने भाँति भाँति के भेष बनाये, नागर नगर गाँव गाँव गली गली घर घर खोज खोज लगे मारने और यदुबंसी दुख पाय पाय देस छोड़ छोड़ जी ले ले भागने।

विसी समै बसुदेव की जो और स्त्रियाँ थीं सो भी रोहनी समेत मथुरा से गोकुल में आईं, जहाँ बसुदेवजी के परम मित्र नंद जी रहते थे। तिन्होंने अति हित से आसा भरोसा दे रक्खा। वे आनंद से रहने लगीं। अब कंस देवताओं को यों सताने औ