पृष्ठ:बंकिम निबंधावली.djvu/१०३

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बंकिम-निबन्धावली—
 

इसी तरह भारतवर्षका क्षति-स्वीकार देखा जाता है। इसी तरह और भी बातें हैं।

राजाके दूर रहनेके कारण आधुनिक भारतवर्षके सुशासनमें विघ्न अवश्य होता है, किन्तु राजाके स्वेच्छाचारी होनेसे सुशासनमें जिन विघ्नोंके संघटित होनेकी संभावना होती है, वे विघ्न नहीं होते। पहलेके जमानेमें ऐसा होता था कि कोई राजा विषयी है—महलोंमें ही रहता है, राज्यकी दुर्दशा हो गई। कोई राजा निष्ठुर है, कोई राजा धनका लोभी है। प्राचीन भारतमें इस तरहकी भारी असुविधायें होती थीं। इस समय दूर-स्थित राजा या रानीमें यदि इस प्रकारका कोई दोष आ भी जाय, तो उसका फल भारतवर्ष तक अपना असर नहीं डाल सकता।

दूसरे, जैसे आधुनिक भारतवर्षमें इंग्लैंडकी भलाईके लिए कभी कभी भारतको हानि उठानी पड़ती है, वैसे ही प्राचीन भारतमें राजाके आत्म- सुखके लिए राज्यको हानि उठानी पड़ती थी । पृथ्वीराजने जयचन्द्रकी कन्याको हरकर आत्म-सुखका संपादन किया । उससे भयानक युद्ध ठन गया। दोनोंमें मनोमालिन्य बढ़नसे और दोनोंकी शक्ति क्षीण होनेसे दोनों ही मुसलमानोंके शिकार बने और उनके इस कृत्यसे प्रजाको धनहानि, जनहानि, प्राणहानि तक उठानी पड़ी । आधुनिक भारतवर्षमें दूरवासी राजाके आत्मसुखके अनुरोधसे इस प्रकारका कोई अनिष्ट होनेकी संभावना नहीं है।

किन्तु यह जो कुछ कहा गया वह परतन्त्रताके सम्बन्धमें ही कहा गया है। हम पहले ही परतन्त्रता और पराधीनतामें अन्तर दिखा चुके हैं । भारतमें अँगरेजोंकी प्रधानता है, दसी प्रजामात्र अँगरेजोंका दबाव मानती और है अँगरेजोंके सुखके लिए भारतवासियोंको कुछ कुछ अपने सुखकी हानि भी स्वीकार करनी पड़ती है, इस बातको इस देशका कोई आदमी अस्वीकार न करेगा। इस प्रकार एक जातिके ऊपर दूसरी जातिकी प्रधा-नता प्राचीन भारतमें नहीं थी। यह बात तो नहीं थी, किन्तु इसीके समान वर्ण-विभागका पीड़न था। इस बातको कोई अस्वीकार न करेगा कि

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