पृष्ठ:बंकिम निबंधावली.djvu/१३६

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अनुकरण ।
 

'अनुकरण' को आजकल लोग गालीसे बढ़कर समझते हैं। इसका कारण यही है कि प्रतिभाशून्य लोगोंकी अनुकरणमें प्रवृत्ति और उसका बुरा फल देख कर लोगोंको उसपर अश्रद्धा या अरुचि हो गई है । असमर्थ मनुष्यके लिए अनुकरणसे बढ़कर हँसीकी बात और नहीं है। एक तो वह खुद बुरा, उसपर उसका अन्ध अनुकरण करना किसको अच्छा लगेगा?

यदि प्रतिभाशाली व्यक्ति अनुकरण करे तो वह कभी घृणाके योग्य नहीं। हम लोगोंकी इस समय जो दशा हो रही है, उसे देखते हमारी अनुकरणकी प्रवृत्ति बुरी या अनुचित नहीं कही जा सकती। हमारी समझमें तो ऐसा अनुकरण मनुष्यके स्वभावसे ही सिद्ध है। ऐसा अनुकरण करने में अगर कोई हिन्दुस्तानियोंको दोष दे, तो हमें तो उसका कोई यथेष्ट कारण नहीं देख पड़ता। यह तो मनुष्यका स्वभावसिद्ध गुण ( या दोष ) है। जब उत्कृष्ट और निकृष्ट मिलते हैं तब निकृष्टको उत्कृष्टके समान होनेकी अभिलाषा होना एक स्वाभाविक बात है। समान होनेका उपाय क्या है ? उपाय यही है कि उत्कृष्ट लोग जैसा करते हैं, निकृष्ट लोग भी वैसा ही करें। इसीको अनुकरण कहते हैं। आजकलके हिन्दुस्तानी लोग देखते हैं कि अँगरेज लोग सभ्यतामें, शिक्षामें, बलमें, ऐश्वर्यमें, सुखमें, विद्यामें सब बातोंमें उनसे श्रेष्ठ हैं। तब हिन्दुस्तानी लोग क्यों न अँगरेजोंके समान होना चाहेंगे? हिन्दुस्तानी लोग समझते हैं कि अँगरेज लोग जो जो करते हैं, उसका अनुकरण करनेसे हम भी उन्हींके ऐसे सभ्य, शिक्षित, सम्पन्न और सुखी हो जायेंगे। चाहे कोई भी जाति हो, हिन्दुस्तानियोंकी सी अवस्थामें आकर वह भी यही करती। यह अनुकरण-प्रवृत्ति केवल हिन्दुस्तानियोंके स्वभावका दोष नहीं है। कमसे कम उच्च जातियोंके हिन्दू आर्योंके वंशमें उत्पन्न हैं। उनके शरीरमें इस समय भी आर्योंका रक्त लहरें मार रहा है। वे कभी वानरोंकी तरह केवल अनु- करण-प्रिय नहीं हो सकते । उनके अनुकरणका कुछ उद्देश्य है। उनका अनुकरण स्वाभाविक और अन्तमें मङ्गलदायक हो सकता है। जो लोग हमें अँगरेजोंकी पोशाक, रहन-सहन और खाने-पीनेका अनुकरण करते देख कर जल उठते हैं, वे अँगरेजोंको फ्रान्सके खान-पान और पहनावेका अनु- करण करते देखकर क्या कहेंगे ? अनुकरण करनेमें क्या अंगरेज लोग

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