पृष्ठ:बंकिम निबंधावली.djvu/१६८

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जुगनू ।
 

प्रणाम कर रहे हैं। किसान खेत जोत रहा है, लड़के भीग रहे हैं । केवल बनियेकी औरत आमका रस लिए भीतर भागी जा रही है । मर हराम- जादी ! दो एक अमरसके टुकड़े रक्खे न जा—हम खायेंगी । दो, इसके कपड़े भिगो दो।

हमने जलकी जातिमें जन्म पाया है, लेकिन तो भी हम रंग-रस करना जानती हैं। लोगोंके छप्पर फाड़कर घरके भीतर झाँकती हैं—स्त्री-पुरुष जिस घरमें सोये होते हैं, वहाँ छतके छेदसे भीतर जाकर उनको चौंका देती हैं । जिस राहमें बह-बेटियाँ कलसी लेकर पानी भरने जाती हैं, उसी राहमें हम कीचड़ कर रखती हैं । चमेलीका पराग धो डालकर भौंरोंको भूखों मारती हैं। नौकर-चाकर कपड़ा धोकर फैलाते हैं तो उसे कीचड़में डालकर उनका काम बढ़ा देती हैं। हम क्या कम दिल्लगीबाज हैं ? तुम सब चाहे जो कुछ कहो, हम रसिका हैं।

खैर इसे जाने दो, हमारा बल देखो । देखो, पर्वत, कन्दरा, घर-द्वार आदि सबको धोकर हम एक नई ही हरीभरी पृथ्वीकी रचना कर देंगी । देखो, शिथिल दुर्बल नदीको कूलप्लाविनी, देशको डुबानेवाली, अनन्त-तरंग- संकुला लंबे-चौड़े पाटकी जल-राक्षसी बना देंगी। किसी देशके मनुष्योंकी रक्षा करेंगी, किसी देशके मनुष्योंका ( बहियाके द्वारा ) संहार करेंगी— कितने ही जहाजोंको ठिकानेपर पहुंचा देंगी और कितने ही जहाजोंको डुबाकर ठिकाने लगा देंगी, पृथ्वीको जलमयी बना देंगी। फिर भी हम क्षुद्र हैं ? हमारा ऐसा क्षुद्र और कौन है ? हमारा ऐसा बलवान् और कौन है ?

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जुगनू ।

ह मेरी समझमें नहीं आता कि जुगनू क्यों हमारे उपहासका पात्र है। जान पड़ता है, चन्द्र-सूर्य आदि बड़े प्रकाशोंके संसारमें रहनेके कारण ही जुगनूका इतना अपमान है । जहाँ अल्पगुणविशिष्ट व्यक्तिका उपहास करना होता है, वहीं वक्ता या लेखक जुगनूका आश्रय ग्रहण करते हैं किन्तु मुझे देख पड़ता है कि जुगनूके थोड़ा हो या बहुत, प्रकाश तो है

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