पृष्ठ:बंकिम निबंधावली.djvu/४१

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बंकिम-निबन्धावली—
 

नहीं कि. इस प्रकार विशेष विचारके बिना ऋषियों और पण्डितोंके हरएक मतको ग्रहण करना भी भारतवर्षकी अवनतिका एक कारण है। यहाँके दार्श- निकोंकी इस एक क्षुद्र भ्रान्तिसे साधारण कुफल या अनिष्ट नहीं हुआ है।

प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्दके अतिरिक्त नैयायिक लोग उपमितिको भी एक स्वतन्त्र प्रमाण समझते हैं। विचार करके देखनेसे यही सिद्ध होगा कि उपमिति अनुमितिका प्रकारभेद मात्र है, और इसी कारण सांख्य आदि दर्शनोंमें उपमितिको एक स्वतन्त्र प्रमाण नहीं माना है। अतएव उपमितिके विस्तृत उल्लेखका प्रयोजन नहीं जान पड़ता। वास्तवमें प्रत्यक्ष और अनुमान ही ज्ञानकी जड़ हैं।

अनुमानकी भी जड़ प्रत्यक्ष ही है। जिस विषयका कभी प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हुआ उसका अनुमान भी नहीं हो सकता। तुम अगर कभी पहले मेघको न देखते या अगर और कोई कभी न देखता, तो तुम बंद दरवाजे- वाले घरमें मेघका गर्जन सुनकर कभी मेघका अनुमान न कर सकते। तुम अगर कभी जूहीकी खुशबूका प्रत्यक्ष ज्ञान न प्राप्त करते, तो अँधेरे घरमें जूहीकी खुशबू सूंघकर कभी अनुमान न कर सकते कि इस घरमें जूहीका फूल है। इसी तरह अन्यान्य पदार्थोंके सम्बन्धमें भी कहा जा सकता है। कभी कभी एक अनुमानकी जड़में बहुतसे बहुजातीय पूर्व-प्रत्यक्ष भी देखे जाते हैं। एक एक वैज्ञानिक नियम हजार हजार तरहके प्रत्यक्ष ज्ञानका

अतएव प्रत्यक्ष ही ज्ञानका एकमात्र मूल है। यही सब प्रमाणोंकी जड़ है। ☆ अनेक लोग यह जानकर विस्मित होंगे कि दर्शनशास्त्र दो-तीन हजार वर्षतक घूम-फिर कर फिर उसी चार्वाकके मतके पास पहुंच गया है। धन्य है आर्य लोगोंकी बुद्धि ! इतने दिनोंके बाद जिसे ह्यूम, मिल, बेन आदिने सिद्ध किया है उसे दो हजार वर्षसे भी पहले बृहस्पति प्रतिपादित कर गये हैं। कोई यह न समझे कि हम यह कह रहे हैं कि प्रत्यक्षके सिवा प्रमाण नहीं है। हम यह कहते हैं कि सब प्रमाणोंकी जड़ प्रत्यक्षप्रमाण है।

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☆ इन सब मतोंको इस समय मैंने त्याग कर दिया है। —ग्रन्थकार।

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