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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/२५५

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चतुर्थ २४७ चपका गुणवाला । चतुर्थ - वि० चौथा । चतुर्थाश्रम - संज्ञा पुं० संन्यास | चतुर्थी - संज्ञा स्त्री० १. चौष । २. वह गंगापूजन आदि कर्म्म जो विवाह के चौथे दिन होता है । चतुर्दशी - संज्ञा बी० चौदस । चतुर्दिक- संज्ञा पुं० चारों दिशाएँ । क्रि० वि० चारों श्रोर । चतुर्भुज - वि० [स्त्री० चतुर्भुजा ] जिसकी चार भुजाएँ । संज्ञा पुं० विष्णु । चतुर्भुजा - संज्ञा स्त्री० १. एक देवी । २. गायत्री रूपधारिणी महाशक्ति । चतुर्भुजी - संज्ञा पुं० एक वैष्णव संप्र- दाय । वि० चार भुजाओंवाला । चतुर्मुख - संज्ञा पुं० ब्रह्मा । वि० चार मुखवाला । क्रि० वि० चारों चोर । . चतुर्युगी - संज्ञा स्त्री० चारों युगों का समय । चारों वेद । चतुर्वेद - संज्ञा पुं० १. परमेश्वर । २. चतुर्वेदी - जाति । संज्ञा पुं० ब्राह्मणों की एक चतुर्व्यूह - संा पुं० १. चार मनुष्यों अथवा पदार्थों का समूह । २. विष्णु । चतुष्कोण - वि० चौकोना । चतुष्टय संज्ञा पुं० चार की संख्या । चतुष्पथ - संज्ञा पुं० चौराहा । चतुष्पद - संज्ञा पुं० चौपाया । वि० [चार पदोंवाला । चतुष्पदा - संज्ञा स्त्री० चौपैया छंद । चतुष्पदी - संज्ञा स्त्री० १ १५ मात्राओं काचौपई छंद । २. चार पद का गीत । परवर-संज्ञा पुं० १. चौमुहानी । २. चबूतरा । चद्दर - संज्ञा स्त्री० १. चादर । २. किसी धातु का लंबा-चौड़ा चौकोर पत्तर । चनकना। - क्रि० प्र० दे० "चटकना" | चनखना- क्रि० प्र० ख़फ़ा होना । चना-संज्ञा पुं० बूट । चपकन-संज्ञा स्त्री० १. किवाड़, संदूक यादि में लोहे या पीतल का वह साज़ जिसमें ताला लगाया जाता है । अँगरखा । २. चपकना - क्रि० प्र० दे० " चिपकना " । चपटना + - क्रि० प्र० दे० " चिपकना" | चपटा - वि० दे० " चिपटा"। चपड़ा - संज्ञा पुं० १. साफ़ की हुई लाख का पत्तर । २. लाल रंग का एक कीड़ा या फतिगा । चपत - संज्ञा पुं० १. थप्पड़ । २. धक्का । चपना- क्रि० भ० दबना । चपनी -संज्ञा बी० कटोरी । - वि० चपरगट्ट - गुत्थमगुरथ । १. चौपटा । २. च परना + ० - क्रि० स० दे० "चुपड़ना"। चपरा - अव्य० झटपट । चपरास - संज्ञा स्त्री० दफर या मालिक का नाम खुदी हुई पीतल आदि की छोटी पट्टी । चपरासी - संज्ञा पुं० प्यादा । चपल - वि० ० १. चंचल । २. चालाक । चपलता - संज्ञा स्त्री० १. चंचलता । २. धृष्टता । चपला - वि० स्त्री० चंचला । संज्ञा स्त्री० १. लक्ष्मी । २. बिजली । ३. जीभ ।