जन जन-संज्ञा पुं० ज्यादती । जमघट -संज्ञा पुं० मनुष्यों की भीड़ जमन - संज्ञा पुं० दे० " यवन" । जमना - क्रि० प्र० १. तरल पदार्थ का ठोस या गाढ़ा हो जाना । स्थिर होना । ३. एकत्र होना । क्रि० भ० उगना । २. संज्ञा स्त्री० दे० "यमुना" । जमा - वि० १. एकत्र । २. जो श्रमा- नत के तौर पर या किसी खाते में रखा गया हो । संज्ञा स्त्री० पूँजी । जमाई - संज्ञा पुं० दामाद । संज्ञा स्त्री० जमने या जमाने की क्रिया या भाव । जमा खर्च -संज्ञा पुं० श्राय और व्यय । जमात - संज्ञा स्त्री० १. मनुष्यों का समूह । २. कक्षा | जमादार - संज्ञा पुं० [ संज्ञा जमादारी ] सिपाहियों या पहरेदारों आदि का प्रधान । ज़मानत -संज्ञा स्त्री० ज़ामिनी । जमाना - क्रि० स० जमने में सहायक होना । ज़माना -संज्ञा पुं० १. समय । २. मुद्दत । ३. दुनिया । जमानासाज्ञ - वि० जो लोगों का रंग- ढंग देखकर व्यवहार करता हो । जमाबंदी - संथा खो० पटवारी का एक काग़ज़ जिसमें असामियों के लगान की में लिखी जाती हैं। जमामार - वि० दूसरों का धन दबा रखने या ले लेनेवाला । जमालगोटा -संज्ञा पुं० एक पौधे का बीज जो अत्यंत रेचक होता है। जयपाल । 1 1 २८० ज़रलेश जमाव -संज्ञा पुं० जमने का भाव । जमावट -संज्ञा स्त्री० जमने का भाव । जमावड़ा-संज्ञा पुं० भीड़ । ज़मींद-संज्ञा पुं० सूरन । ज़मींदार -संज्ञा पुं० ज़मीन का मालिक। ज़मींदारी -संज्ञा स्त्री० ज़मींदार की वह ज़मीन जिसका वह मालिक हो । ज़मीन -संज्ञा स्त्री० १. पृथ्वी । २. भूमि । पुत्र १. विजय करने- ३ वर्षेfo जमुहाना + - क्रि० प्र० दे० "जभाना" । जम्हाना - क्रि० प्र० दे० "जैभाना" । जयंत - वि० [स्त्री० जयंती ] विजयी । संज्ञा पुं० १. रुद्र । २. इंद्र का नाम । जयंती - संज्ञा स्त्री० वाली । २. ध्वजा । का उत्सव । ४. जई | जय-संज्ञा स्त्री० जीत । जयना - क्रि० प्र० जीतना । जयमाल -संज्ञा स्त्री० १. वह माला जो विजयी को विजय पाने पर पह- नाई जाय । २. वह माला जिसे स्वयंवर के समय कन्या अपने वरे हुए पुरुष के गले में डालती थी । जयस्तंभ - संज्ञा पुं० विजय का स्मारक स्तंभ । जया -संज्ञा स्त्री० १. ३. पताका । वि० जयकारिणी | जयी - वि० विजयी । दुर्गा । २. पार्वती जर संज्ञा पुं० वृद्धावस्था । ज़र - संज्ञा पुं० १. सोना । २. धन । जरकस, जरकसी - वि० जिस पर सोने के तार आदि लगे हो । झरख ज-वि० उपजाऊ ।
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