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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/३११

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भोली भोली - संज्ञा श्री० १. कपड़े को मोड़- कर बनाई हुई थैली । २. घास बाँध- ने का जास्त । संज्ञा स्त्री० राख । झोलना - क्रि० स० जलाना । भौर - संज्ञा पुं० झु ंड । भौरना - क्रि० भ० गूँजना | भौराना- क्रि० भ० भूमना । ३०३ टगना क्रि० प्र० १. माँवले रंग का हो जाना । २. मुरझाना | भौसना- क्रि० स० दे० "झुलसना" । भौर - संज्ञा पुं० १. हुज्जत । २. डांट- फटकार । भारना - क्रि० स० छोप लेना । भौरे - क्रि० वि० १. समीप । २. साथ । भौवा ! - संज्ञा पुं० खचिया । भौहाना- क्रि० प्र० गुर्राना । ञ - हिंदी वर्णमाला का दसवीं व्यंजन जो चवर्ग का पाँचवाँ वर्ण है । ञ इसका उच्चारण-स्थान तालू और नासिका है। ट 64 ट-संस्कृत या हिंदी वर्णमाला में ग्यारहव व्यंजन जो टवर्ग का पहला वर्ण है। इसका उच्चारण-स्थान मूर्द्धा है। टंक संज्ञा पुं० १. चार माशे की एक तौल । २. सिक्का । ३. छेनी । टंकरण - संज्ञा पुं० १. सुहागा। २. धातु की चीज़ में टांके से जोड़ लगाने का कार्य । टँकना - क्रि० प्र० २. सिलना । टँकवाना - क्रि० स० दे० " टँकाना" | टंकाई -संज्ञा स्त्री० टाँकने की क्रिया, भाव या मज़दूरी । १ टीका जाना । । टँकाना - क्रि० स० १. टाँकों से जोड़- वाना या सिलवाना। २. सिलाकर लगवाना । टंकार - संज्ञा स्त्री० फनकार | टंकारना - क्रि० स० धनुष की डोरी खींचकर शब्द करना । टंकी -संज्ञा स्त्री० पानी भरने का बनाया हुआ छोटा सा कुंड या बड़ा बरतन । टीका । टंकोर-संज्ञा पुं० दे० " टंकार" । टंकोरना- क्रि० स० दे० " टंकारना" | टँगड़ा - संज्ञा खी० दे० "टींग" । टँगना - क्रि० प्र० लटकना । संज्ञा पुं० अलगनी ।