तंत्र ३२१ तकाई तंत्र - संज्ञा पुं० फूकने का मंत्र । तंत्री-संज्ञा स्त्री० १. सितार आदि बाजों में लगा हुआ तार । २. बाजा जिसमें बजाने के लिये तार लगे हों । संज्ञा पुं० वह जो बाजा बजाता हो । तंदुरुस्त - वि० नीरोग । तंदुरुस्ती - संज्ञा स्त्री० स्वास्थ्य । तंदुल - संज्ञा पुं० दे० " तंडुल" | तंदेही - संज्ञा स्त्री० १. परिश्रम । २. १. सूत । २. झाड़ने प्रयत्न । तंद्रा - संज्ञा स्त्री० १. बँधाई । २. हलकी बेहोशी । तंद्रालु - वि० जिसे तंद्रा श्राती हो । तंबाकू - संज्ञा पुं० दे० "तमाकू" । तँबिया - संज्ञा पुं० ताँबे या और किसी चीज़ का बना हुआ छोटा तसला । तैंबियाना- क्रि० प्र० १. तांबे के रंग का होना। २. तांबे के बरतन में रहने के कारण किसी पदार्थ में तांबे का स्वाद या गंध आ जाना । तंबीह - संज्ञा स्त्री० १. नसीहत । २. ताकीद । तंबू - संज्ञा पुं० शामियाना । तंबूरची - संज्ञा पुं० तंबूरा बजानेवाला । तंबूरा -संज्ञा पुं० बीन या सितार की तरह का एक बाजा । तानपूरा । तंबूल + - संज्ञा पुं० दे० "तांबूल " । तँबोली- संज्ञा पुं० वह जो पान बेचता हो । बरई । ताज्जुब -संज्ञा पुं० श्रश्वय्र्थ्य । ताल्लुकः- संज्ञा पुं० बड़ा इलाका | ताल्लुकः दार-संज्ञा पुं० इलाकेदार । तअल्लुकःदारी-संज्ञा स्त्री० तअल्लुकः दार का पद या भाव । २१ ताल्लुक - संज्ञा पुं० संबंध | तअल्लुका -संज्ञा पुं० दे० "तन- ल्लुकः" । तश्रस्सुब- संज्ञा पुं० धर्म या जाति- संबंधी पक्षपात | तसा / - वि० दे० " वैसा" । त - प्रत्य० से । प्रत्य० प्रति । अव्य० लिये । तई - संज्ञा स्त्री० थाली के आकार की छिछली कड़ाही | - तउ भव्य० १. दे० " तब" । २. दे० "त्यों" । तऊ + - भव्य ० तो भी । तक - भव्य० पर्यंत । । संज्ञा खो० दे० "टक" । तक़दीर - संज्ञा स्त्री० भाग्य | तक़दीरवर - वि० भाग्यवान् । तकन- संज्ञा स्त्री० देखना । तकना - क्रि० प्र० देखना । तकमा । - संज्ञा पुं० दे० " तमगा" । तकरार - संज्ञा स्त्री० हुज्जत । तकरीर - संज्ञा स्त्री० १. बातचीत । २. वक्तृता । तकला - संज्ञा पुं० [स्त्री० अल्पा० तकली] १. चरखे में लोहे की वह सलाई जिस पर सूत लिपटता जाता है । टेकुना । २. रस्सी बनाने की टिकुरी । तकलीफ -संज्ञा स्त्री० १. कष्ट । २० विपत्ति । - तकल्लुफ -संज्ञा पुं० शिष्टाचार । तकसीम -संज्ञा स्त्री० १. बँटाई । २० भाग । तकाई -संज्ञा श्री० ताकने की क्रिया या भाव ।
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