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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/३४३

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तिनकना तिनकना- क्रि० प्र० चिढ़ना । तिनका- संज्ञा पुं० तृण । तिनगना- क्रि० प्र० दे० "तिनकना" । तिनगरी - संज्ञा स्त्री० एक प्रकार का पकवान । तिनपहला - वि० जिसमें तीन पहल या पार्श्व हो । पुं० सीसम की जाति तिनिश - संज्ञा का एक पेड़ । तिनूका संज्ञा पुं० दे० "तिनका " । तिन्ह | - सर्व० दे० " तिन” । तिपल्ला - वि० जिसमें तीन पल्ले हैं। । तिपाई -संज्ञा स्त्री० तीन पायों की बैठने या घड़ा आदि रखने की छोटी ऊँची चकी । तिपाड़ - संज्ञा पुं० १. जो तीन पाट जोड़कर बना हो । २. जिसमें तीन पल्ले हैं। । तिबारा - वि० तीसरी बार । संज्ञा पुं० वह घर या कोठरी जिसमें तीन द्वार हो । तिब्बत -संज्ञा पुं० एक देश जो हिमा- लय के उत्तर में है । तिब्बती- वि० तिब्बत का । संज्ञा स्त्री० तिब्बत की भाषा । संज्ञा पुं० तिब्बत का रहनेवाला । ३३५ तिमंज़िला - वि० [स्त्री० तिमंजिली ] तीन खंडों का । तिमि भव्य० उस प्रकार । तिमिर-संज्ञा पुं० अंधकार । तिमिरहर - संज्ञा पुं० सूर्य्य । तिमिरारि-संज्ञा पुं० सूर्य । तिमिरारी : - संज्ञा स्त्री० अँधेरा । तिमिरावलि -संज्ञा श्री० अंधकार का समूह । तिरलोक तिमुहानी-संज्ञा स्त्री० वह स्थान जहाँ तीन ओर जाने को तीन मार्ग हैं। । तिय-संज्ञा स्त्री० स्त्री । तिया-संज्ञा पुं० तिक्की ।

  • संज्ञा स्त्रो० दे० "तिय" ।

तिरखूँटा - वि० तिरकोना । तिरछई !- संज्ञा खो० तिरछापन | तिरछा - वि० जो ठीक सामने की ओर न जाकर इधर उधर हटकर गया हो । तिरछाई | संज्ञा खो० तिरछापन | तिरछाना- क्रि० प्र० तिरछा होना । तिरछापन - संज्ञा पुं० तिरछा होने का भाव । तिरछाहीं - वि० जो कुछ तिरछापन लिए हो । तिरछा हैं - क्रि० वि० तिरछेपन साथ । तिरना- क्रि० प्र० १. उत्तराना । २. तैरना । तिरप-संज्ञा नृत्य में एक प्रकार की गति । • तिरपटा - वि० १ तिरछा । २. मुश्किल । तिरपाई - संज्ञा स्त्री० तीन पायों की ऊँची चौकी । तिरपाल - संज्ञा पुं० फूस या सरकंडों के लंबे पूले जो छाजन में खपड़ों के नीचे दिए जाते हैं । संज्ञा पुं० रोग़न चढ़ा हुआ कनवास या टाट । | तिरबेनी-संज्ञा खो० दे० " त्रिवेणी" । तिरमिरा - संज्ञा पुं० चकाचौंध । तिरमिराना- क्रि० प्र० चौंधियाना । तिरलोक / - संज्ञा पुं० दे० " त्रिलोक" ।